भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 816

वे कानतक खींचकर छोड़े हुए और अविच्छिन्न गतिसे परस्पर सटकर निकलते हुए बाणोंद्वारा पाँच, छः, सात और आठ यवनोंको एक ही साथ विदीर्ण कर डालते थे ।। ४४ १/२ ।।

काम्बोजानां सहस्रैश्च शकानां च विशाम्पते ।। ४५ ।। शबराणां किरातानां बर्बराणां तथैव च । अगम्यरूपां पृथिवीं मांसशोणितकर्दमाम् ।। ४६ ।। कृतवांस्तत्र शैनेयः क्षपयंस्तावकं बलम् ।

प्रजानाथ! सात्यकिने आपकी सेनाका संहार करते हुए वहाँकी भूमिको सहस्रों काम्बोजों, शकों, शबरों, किरातों और बर्बरोंकी लाशोंसे पाटकर अगम्य बना दिया था। वहाँ मांस और रक्तकी कीच जम गयी थी ।। ४५-४६ १/२ ।।

दस्यूनां सशिरस्त्राणैः शिरोभिर्लूनमूर्धजैः ।। ४७ ।। दीर्घकूर्चैर्मही कीर्णा विबर्हैरण्डजैरिव ।

उन लुटेरोंके लंबी दाढ़ीवाले शिरस्त्राणयुक्त मुण्डित मस्तकोंसे आच्छादित हुई रणभूमि पंखहीन पक्षियोंसे व्याप्त हुई-सी जान पड़ती थी ।। ४७ १/२ ।।

रुधिरोक्षितसर्वाङ्गैस्तैस्तदायोधनं बभौ ।। ४८ ।। कबन्धैः संवृतं सर्वं ताम्राभ्रैः खमिवावृतम् ।

जिनके सारे अंग खूनसे लथपथ हो रहे थे, उन कबन्धोंसे भरा हुआ वह सारा रणक्षेत्र लाल रंगके बादलोंसे ढके हुए आकाशके समान जान पड़ता था ।।

वज्राशनिसमस्पर्शैः सुपर्वभिरजिह्मगैः ।। ४९ ।। ते सात्वतेन निहताः समावव्रुर्वसुंधराम् ।

वज्र और विद्युत्के समान कठोर स्पर्शवाले सुन्दर पर्वयुक्त बाणोंद्वारा सात्यकिके हाथसे मारे गये उन यवनोंने वहाँकी भूमिको अपनी लाशोंसे ढक लिया ।।

अल्पावशिष्टाः सम्भग्नाः कृच्छ्रप्राणा विचेतसः ।। ५० ।। जिताः संख्ये महाराज युयुधानेन दंशिताः । पाष्णिर्भिंश्च कशाभिश्च ताडयन्तस्तुरङ्गमान् ।। ५१ ।। जवमुत्तममास्थाय सर्वतः प्राद्रवन् भयात् ।

महाराज! थोड़े-से यवन शेष रह गये थे, जो बड़ी कठिनाईसे अपने प्राण बचाये हुए थे। वे अपने समुदायसे भ्रष्ट होकर अचेत-से हो रहे थे। उन सभी कवचधारी यवनोंको युयुधाने युद्धस्थलमें जीत लिया था। वे हाथों और कोड़ोंसे अपने घोड़ोंको पीटते हुए उत्तम वेगका आश्रय ले चारों ओर भयके मारे भाग गये ।। ५०-५१ १/२ ।।

काम्बोजसैन्यं विद्राव्य दुर्जयं युधि भारत ।। ५२ ।। यवनानां च तत् सैन्यं शकानां च महद्बलम् । ततः स पुरुषव्याघ्रः सात्यकिः सत्यविक्रमः ।। ५३ ।।