भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

सात्यकिद्वारा दुर्योधनकी सेनाका संहार तथा भाइयोंसहित दुर्योधनका पलायन

संजय उवाच

जित्वा यवन काम्बोजान् युयुधानस्ततोऽर्जुनम् ।
जगाम तव सैन्यस्य मध्येन रथिनां वरः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! रथियोंमें श्रेष्ठ युयुधान यवनों और काम्बोजोंको पराजित करके आपकी सेनाके बीचसे होते हुए अर्जुनकी ओर चले ॥ १ ॥

चारुदंष्ट्रो नरव्याघ्रो विचित्रकवचध्वजः ।
मृगं व्याघ्र इवाजिघ्रंस्तव सैन्यमभीषयत् ॥ २ ॥
पुरुषसिंह सात्यकिके दाँत बड़े सुन्दर थे। उनके कवच और ध्वज भी विचित्र थे। वे मृगकी गन्ध लेते हुए व्याघ्रके समान आपकी सेनाको भयभीत कर रहे थे ॥ २ ॥

स रथेन चरन् मार्गान् धनुरभ्रामयद् भृशम् ।
रुक्मपृष्ठं महावेगं रुक्मचन्द्रकसंकुलम् ॥ ३ ॥
युयुधान रथके द्वारा विभिन्न मार्गोंपर विचरते हुए अपने उस महावेगशाली धनुषको जोर-जोरसे घुमा रहे थे, जिसका पृष्ठभाग सोनेसे मढ़ा था और जो सुवर्णमय चन्द्राकार चिह्नोंसे व्याप्त था ॥ ३ ॥

रुक्माङ्गदशिरस्त्राणो रुक्मवर्मसमावृतः ।
रुक्मध्वजधनुः शूरो मेरुशृङ्गमिवाबभौ ॥ ४ ॥
उनके भुजबंद और शिरस्त्राण सुवर्णके बने हुए थे। वे स्वर्णमय कवचसे आच्छादित थे। सोनेके ध्वज और धनुषसे सुशोभित शूरवीर सात्यकि मेरुपर्वतके शिखरकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ ४ ॥

सधनुर्मण्डलः संख्ये तेजोभास्कररश्मिवान् ।
शरदीवोदितः सूर्यो नृसूर्यो विरराज ह ॥ ५ ॥
युद्धस्थलमें मण्डलाकार धनुष धारण किये अपने तेजस्वरूप सूर्यरश्मियोंसे प्रकाशित, मानव-सूर्य सात्यकि शरत्कालमें उगे हुए सूर्यदेवके समान देदीप्यमान हो रहे थे ॥ ५ ॥

वृषभस्कन्धविक्रान्तो वृषभाक्षो नरर्षभः ।
तावकानां बभौ मध्ये गवां मध्ये यथा वृषः ॥ ६ ॥
उनके कंधे और चाल-ढाल वृषभके समान थे। नेत्र भी वृषभके ही तुल्य बड़े-बड़े थे। वे नरश्रेष्ठ सात्यकि आपके सैनिकोंके बीचमें उसी प्रकार सुशोभित होते थे, जैसे गौओंके