महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 831, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंपत्थरके चूर्णोंसे व्याप्त हुए मनुष्य, हाथी और घोड़े वहाँ ठहर न सके, मानो उन्हें भ्रमरोंने डस लिया हो ॥ ४५ ॥ हतशिष्टाः सरुधिरा भिन्नमस्तकपिण्डिकाः । (विभिन्नशिरसो राजन् दन्तैश्छिन्नैश्च दन्तिनः । निर्धूतैश्च करैर्नागा व्यङ्गाश्च शतशः कृताः ॥ हत्वा पञ्चशतान् योधांस्तत्क्षणेनैव मारिष । व्यचरत् पृतनामध्ये शैनेयः कृतहस्तवत् ॥) कुञ्जरा वर्जयामासुर्युयुधानरथं तदा ॥ ४६ ॥ जो मरनेसे बचे थे, वे हाथी भी खूनसे लथपथ हो रहे थे। उनके कुम्भस्थल विदीर्ण हो गये थे। राजन्! बहुत-से हाथियोंके सिर क्षत-विक्षत हो गये थे। उनके दाँत टूट गये थे, शुण्डदण्ड खण्डित हो गये थे तथा सैकड़ों गजराजोंके सात्यकिने अंग-भंग कर दिये थे। माननीय नरेश! सात्यकि सिद्धहस्त पुरुषकी भाँति क्षणभरमें पाँच सौ योद्धाओंका संहार करके सेनाके मध्यभागमें विचरने लगे। उस समय घायल हुए हाथी युयुधानके रथको छोड़कर भाग गये ॥ ४६ ॥ (अश्मनां भिद्यमानानां सायकैः श्रूयते ध्वनिः । पद्मपत्रेषु धाराणां पतन्तीनामिव ध्वनिः ॥) बाणोंसे चूर-चूर होनेवाले पत्थरोंकी ऐसी ध्वनि सुनायी पड़ती थी, मानो कमलदलोंपर गिरती हुई जलधाराओंका शब्द कानोंमें पड़ रहा हो। ततः शब्दः समभवत् तव सैन्यस्य मारिष । माधवेनार्द्यमानस्य सागरस्येव पर्वणि ॥ ४७ ॥ आर्य! जैसे पूर्णिमाके दिन समुद्रका गर्जन बहुत बढ़ जाता है, उसी प्रकार सात्यकिके द्वारा पीड़ित हुई आपकी सेनाका महान् कोलाहल प्रकट हो रहा था ॥ ४७ ॥ तं शब्दं तुमुलं श्रुत्वा द्रोणो यन्तारमब्रवीत् । एष सूत रणे क्रुद्धः सात्वतानां महारथः ॥ ४८ ॥ दारयन् बहुधा सैन्यं रणे चरति कालवत् । यत्रैष शब्दस्तुमुलस्तत्र सूत रथं नय ॥ ४९ ॥ उस भयंकर शब्दको सुनकर द्रोणाचार्यने अपने सारथिसे कहा—'सूत! यह सात्वतकुलका महारथी वीर सात्यकि रणक्षेत्रमें क्रुद्ध होकर कौरव-सेनाको बारंबार विदीर्ण करता हुआ कालके समान विचर रहा है। सारथे! जहाँ यह भयानक शब्द हो रहा है, वहीं मेरे रथको ले चलो ॥ ४८-४९ ॥ पाषाणयोधिभिर्नूनं युयुधानः समागतः । तथा हि रथिनः सर्वे ह्रियन्ते विद्रुतैर्हयैः ॥ ५० ॥