भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 836

‘कौरव! अकेले सात्यकिके साथ युद्ध करते समय, जब आज तुम्हारी बुद्धि संग्रामसे

पलायन करनेमें प्रवृत्त हो गयी, तुमने भागनेका विचार कर लिया, तब जिस समय तुम

गाण्डीवधारी अर्जुन, भीमसेन अथवा नकुल-सहदेवको युद्धस्थलमें देखोगे, उस समय तुम

क्या करोगे? ।। १३-१४ १/२ ।।

युधि फाल्गुनबाणानां सूर्याग्निसमवर्चसाम् ।। १५ ।।

न तुल्याः सात्यकिशरा येषां भीतः पलायसे ।

‘रणक्षेत्रमें अर्जुनके बाण सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी हैं। उनके समान सात्यकिके

बाण नहीं हैं, जिनसे भयभीत होकर तुम भागे जा रहे हो ।। १५ १/२ ।।

त्वरितो वीर गच्छ त्वं गान्धार्युदरमाविश ।। १६ ।।

पृथिव्यां धावमानस्य नान्यत् पश्यामि जीवनम् ।

‘वीर! जल्दी जाओ। अपनी माता गान्धारीदेवीके पेटमें घुस जाओ; अन्यथा इस

भूतलपर दूसरा कोई ऐसा स्थान नहीं है, जहाँ भाग जानेसे मुझे तुम्हारे जीवनकी रक्षा

दिखायी देती हो ।। १६ १/२ ।।

यदि तावत् कृता बुद्धिः पलायनपरायणा ।। १७ ।।

पृथिवी धर्मराजाय शमेनैव प्रदीयताम् ।

‘यदि तुमने भागनेका ही विचार कर लिया है, तब यह पृथ्वीका राज्य शान्तिपूर्वक ही

धर्मराज युधिष्ठिरको सौंप दो ।। १७ १/२ ।।

यावत् फाल्गुननाराचा निर्मुक्तोरगसंनिभाः ।। १८ ।।

नाविशन्ति शरीरं ते तावत् संशाम्य पाण्डवैः ।

‘केंचुल छोड़कर निकले हुए सर्पोंके समान अर्जुनके बाण जबतक तुम्हारे शरीरमें नहीं

घुस रहे हैं, तबतक ही तुम पाण्डवोंके साथ संधि कर लो ।। १८ १/२ ।।

यावत् ते पृथिवीं पार्था हत्वा भ्रातृशतं रणे ।। १९ ।।

नाक्षिपन्ति महात्मानस्तावत् संशाम्य पाण्डवैः ।

‘महामनस्वी कुन्तीकुमार जबतक तुम्हारे सौ भाइयोंको रणक्षेत्रमें मारकर यह सारी

पृथ्वी तुमसे छीन नहीं लेते हैं, तभीतक तुम पाण्डवोंके साथ संधि कर लो ।। १९ १/२ ।।

यावन्न क्रुद्ध्यते राजा धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।। २० ।।

कृष्णश्च समरश्लाघी तावत् संशाम्य पाण्डवैः ।

‘जबतक धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर तथा युद्धकी प्रशंसा करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण क्रोध

नहीं करते हैं, तभीतक तुम पाण्डवोंके साथ संधि कर लो ।। २० १/२ ।।

यावद् भीमो महाबाहुर्विगाह्य महतीं चमूम् ।। २१ ।।

सोदरांस्ते न गृह्णाति तावत् संशाम्य पाण्डवैः ।