महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 854, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें**धृतराष्ट्रने पूछा—**सूत! जब इस प्रकार सारी सेनाएँ भाग रही थीं, उस समय स्वयं भी वैसे संकटमें पड़े हुए दुर्योधनने क्या उस युद्धमें पीठ नहीं दिखायी? ।। २६१/२ ।। एकस्य च बहूनां च संनिपातों महाहवे ।। २७ ।। विशेषतो नरपतेर्विषमः प्रतिभाति मे । उस महासमरमें बहुत-से योद्धाओंके साथ किसी एक वीरका विशेषतः राजा दुर्योधनका युद्ध करना तो मुझे विषम (अयोग्य) प्रतीत हो रहा है ।। २७१/२ ।। सोऽत्यन्तसुखसंवृद्धो लक्ष्म्या लोकस्य चेश्वरः ।। २८ ।। एको बहून् समासाद्य कच्चिन्नासीत् पराङ्मुखः । अत्यन्त सुखमें पला हुआ, इस लोक तथा राजलक्ष्मीका स्वामी अकेला दुर्योधन बहुसंख्यक योद्धाओंके साथ युद्ध करके रणभूमिसे विमुख तो नहीं हुआ? ।।
संजय उवाच
राजन् संग्राममाश्चर्यं तव पुत्रस्य भारत ।। २९ ।। एकस्य बहुभिः सार्धं शृणुष्व गदतो मम । **संजयने कहा—**भरतवंशी नरेश! आपके एकमात्र पुत्र दुर्योधनका शत्रुपक्षके बहुसंख्यक योद्धाओंके साथ जो आश्चर्यजनक संग्राम हुआ था, उसे मैं बताता हूँ, सुनिये ।। २९१/२ ।। दुर्योधनेन समरे पृतना पाण्डवी रणे ।। ३० ।। नलिनी द्विरदेनेव समन्तात् प्रतिलोडिता । दुर्योधनने समरांगणमें पाण्डव-सेनाको सब ओरसे उसी प्रकार मथ डाला, जैसे हाथी कमलोंसे भरे हुए किसी पोखरेको ।। ३०१/२ ।। ततस्तां प्रहितां सेनां दृष्ट्वा पुत्रेण ते नृप ।। ३१ ।। भीमसेनपुरोगास्तं पञ्चालाः समुपाद्रवन् । नरेश्वर! आपके पुत्रद्वारा आपकी सेनाको आगे बढ़नेके लिये प्रेरित हुई देख भीमसेनको अगुआ बनाकर पांचालयोद्धाओंने दुर्योधनपर आक्रमण कर दिया ।। ३११/२ ।। स भीमसेनं दशभिः शरैर्विव्याध पाण्डवम् ।। ३२ ।। त्रिभिस्त्रिभिर्यमौ वीरौ धर्मराजं च सप्तभिः । तब दुर्योधनने पाण्डुपुत्र भीमसेनको दस बाणोंसे, वीर नकुल और सहदेवको तीन-तीन बाणोंसे तथा धर्मराज युधिष्ठिरको सात बाणोंसे घायल कर दिया ।। ३२१/२ ।। विराटद्रुपदौ षड्भिः शतेन च शिखण्डिनम् ।। ३३ ।। धृष्टद्युम्नं च विंशत्या द्रौपदेयांस्त्रिभिस्त्रिभिः ।