भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 856, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 856

तत्पश्चात् आपके प्रतापी पुत्रने दूसरा धनुष लेकर 'खड़ा रह, खड़ा रह' ऐसा कहते हुए वहाँ पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिरपर आक्रमण किया॥ ४० १/२॥
तमायान्तमभिप्रेक्ष्य तव पुत्रं महामृधे॥ ४१॥
प्रत्युद्ययुः समुदिताः पञ्चाला जयगृद्धिनः।
उस महासमरमें आपके पुत्रको आते देख विजयकी अभिलाषा रखनेवाले पांचाल सैनिक संघबद्ध हो उसका सामना करनेके लिये आगे बढ़े॥ ४१ १/२॥
तान् द्रोणः प्रतिजग्राह परीप्सन् युधि पाण्डवम्॥ ४२॥
चण्डवातोद्धुतान् मेघान् गिरिरम्बुमुचो यथा।
उस समय युद्धमें युधिष्ठिरको पकड़नेकी इच्छावाले द्रोणाचार्यने उन सब योद्धाओंको उसी प्रकार रोक दिया, जैसे प्रचण्ड वायुद्वारा उड़ाये गये जलवर्षी मेघोंको पर्वत रोक देता है॥ ४२ १/२॥
तत्र राजन् महानासीत् संग्रामो लोमहर्षणः॥ ४३॥
पाण्डवानां महाबाहो तावकानां च संयुगे।
रुद्रस्याक्रीडसदृशः संहारः सर्वदेहिनाम्॥ ४४॥
राजन्! महाबाहो! फिर तो वहाँ युद्धस्थलमें पाण्डवों तथा आपके सैनिकोंमें महान् रोमांचकारी संग्राम होने लगा। जो रुद्रकी क्रीडाभूमि (श्मशानके सदृश) सम्पूर्ण देहधारियोंके लिये संहारका स्थान बन गया था॥ ४३-४४॥
ततः शब्दो महानासीत् पुनर्येन धनंजयः।
अतीव सर्वशब्देभ्यो लोमहर्षकरः प्रभो॥ ४५॥
प्रभो! तदनन्तर जिधर अर्जुन गये थे, उसी ओर बड़े जोरका कोलाहल होने लगा, जो सम्पूर्ण शब्दोंसे ऊपर उठकर सुननेवालोंके रोंगटे खड़े किये देता था॥
अर्जुनस्य महाबाहो तावकानां च धन्विनाम्।
मध्ये भारतसैन्यस्य माधवस्य महारणे॥ ४६॥
महाबाहो! उस महासमरमें कौरवी सेनाके भीतर आपके धनुर्धरोंकी तथा अर्जुन और सात्यकिकी भीषण गर्जना सुनायी देती थी॥ ४६॥
द्रोणस्यापि परैः सार्धं व्यूहद्वारे महारणे।
एवमेष क्षयो वृत्तः पृथिव्यां पृथिवीपते।
क्रुद्धेऽर्जुने तथा द्रोणे सात्वते च महारथे॥ ४७॥
पृथिवीपते! उस महायुद्धमें व्यूहके द्वारपर शत्रुओंके साथ जूझते हुए द्रोणाचार्यका भी सिंहनाद प्रकट हो रहा था। इस प्रकार अर्जुन, द्रोणाचार्य तथा महारथी सात्यकिके कुपित होनेपर युद्धभूमिमें यह भयंकर विनाशका कार्य सम्पन्न हुआ॥ ४७॥

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