भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 862

अथैनं पञ्चविंशत्या सायकानां समर्पयत् । अवप्लुत्य रथाच्चैद्यो गदामादाय सत्वरः ॥ ३१ ॥ भारद्वाजाय चिक्षेप रुषितामिव पन्नगीम् । तत्पश्चात् उन्होंने धृष्टकेतुको पचीस बाण मारे। उस समय धृष्टकेतुने शीघ्रतापूर्वक रथसे कूदकर गदा हाथमें ले ली और रोषमें भरी हुई सर्पिणीके समान उसे द्रोणाचार्यपर दे मारा ॥ ३१ १/२ ॥

तामापतन्तीमालोक्य कालरात्रिमिवोद्यताम् ॥ ३२ ॥ अश्मसारमयीं गुर्वीं तपनीयविभूषिताम् । शरैरनेकसाहस्रैर्भारद्वाजोऽच्छिनच्छितैः ॥ ३३ ॥ वह गदा लोहेकी बनी हुई और भारी थी। उसमें सोने जड़े हुए थे, उसे उठी हुई कालरात्रिके समान अपने ऊपर गिरती देख द्रोणाचार्यने कई हजार पैने बाणोंसे उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिये ॥ ३२-३३ ॥

सा छिन्ना बहुभिर्बाणैर्भारद्वाजेन मारिष । गदा पपात कौरव्य नादयन्ती धरातलम् ॥ ३४ ॥ माननीय कौरवनरेश! द्रोणाचार्यद्वारा अनेक बाणोंसे छिन्न-भिन्न की हुई वह गदा भूतलको निनादित करती हुई धमसे गिर पड़ी ॥ ३४ ॥

गदां विनिहतां दृष्ट्वा धृष्टकेतुरमर्षणः । तोमरं व्यसृजद् वीरः शक्तिं च कनकोज्ज्वलाम् ॥ ३५ ॥ अपनी गदाको नष्ट हुई देख अमर्षमें भरे हुए वीर धृष्टकेतुने द्रोणाचार्यपर तोमर तथा स्वर्णभूषित तेजस्विनी शक्तिका प्रहार किया ॥ ३५ ॥

तोमरं पञ्चभिर्भित्त्वा शक्तिं चिच्छेद पञ्चभिः । तौ जग्मतुर्महीं छिन्नौ सर्पाविव गरुत्मता ॥ ३६ ॥ द्रोणाचार्यने तोमरको पाँच बाणोंसे छिन्न-भिन्न करके पाँच बाणोंद्वारा धृष्टकेतुकी शक्तिके भी टुकड़े-टुकड़े कर दिये। वे दोनों अस्त्र गरुड़के द्वारा खण्डित किये हुए दो सर्पोंके समान पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ३६ ॥

ततोऽस्य विशिखं तीक्ष्णं वधाय वधकाङ्क्षिणः । प्रेषयामास समरे भारद्वाजः प्रतापवान् ॥ ३७ ॥ तत्पश्चात् अपने वधकी इच्छा रखनेवाले धृष्टकेतुके वधके लिये प्रतापी द्रोणाचार्यने समरभूमिमें उसके ऊपर एक बाणका प्रहार किया ॥ ३७ ॥

स तस्य कवचं भित्त्वा हृदयं चामितौजसः । अभ्यगाद् धरणीं बाणो हंसः पद्मवनं यथा ॥ ३८ ॥ जैसे हंस कमलवनमें प्रवेश करता है, उसी प्रकार वह बाण अमित तेजस्वी धृष्टकेतुके कवच और वक्षःस्थलको विदीर्ण करके धरतीमें समा गया ॥ ३८ ॥