भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 866, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 866

यथाबलं यथोत्साहं यथासत्त्वं महाद्युतिः । मोहयन् सर्वभूतानि द्रोणो हन्ति बलानि नः ॥ ६२ ॥ पाञ्चालसैनिक कहने लगे—‘महातेजस्वी द्रोण अपने बल, उत्साह और धैर्यके अनुसार समस्त प्राणियोंको मोहित करते हुए हमारी सेनाओंका संहार कर रहे हैं’ ॥ ६२ ॥

तेषां तद् वचनं श्रुत्वा क्षत्रधर्मा व्यवस्थितः । अर्धचन्द्रेण चिच्छेद क्षत्रधर्मा महाबलः ॥ ६३ ॥ क्रोधसंविग्नमनसो द्रोणस्य सशरं धनुः । उनकी यह बात सुनकर क्षत्रधर्मा युद्धके लिये द्रोणाचार्यके सामने आकर खड़ा हो गया। उस महाबली वीरने अर्धचन्द्राकार बाण मारकर क्रोधसे उद्विग्न मनवाले द्रोणाचार्यके धनुष और बाणको काट दिया ॥ ६३ १/२ ॥

स संरब्धतरो भूत्वा द्रोणः क्षत्रियमर्दनः ॥ ६४ ॥ अन्यत् कार्मुकमादाय भास्वरं वेगवत्तरम् । तत्राधाय शरं तीक्ष्णं परानीकविशातनम् ॥ ६५ ॥ आकर्णपूर्णमाचार्यो बलवानभ्यवासृजत् । स हत्वा क्षत्रधर्माणं जगाम धरणीतलम् ॥ ६६ ॥ इससे क्षत्रियोंका मर्दन करनेवाले द्रोणाचार्य अत्यन्त कुपित हो उठे और अत्यन्त वेगशाली तथा प्रकाशमान दूसरा धनुष हाथमें लेकर उन्होंने एक तीखा बाण अपने धनुषपर रखा, जो शत्रुसेनाका विनाश करनेवाला था। बलवान् आचार्यने कानतक धनुषको खींचकर उस बाणको छोड़ दिया। वह बाण क्षत्रधर्माका वध करके धरतीमें समा गया ॥ ६४—६६ ॥

स भिन्नहृदयो वाहान्न्यपतन्मेदिनी Kos... तले । ततः सैन्यान्यकम्पन्त धृष्टद्युम्नसुते हते ॥ ६७ ॥ क्षत्रधर्मा हृदय विदीर्ण हो जानेके कारण रथसे पृथ्वीपर गिर पड़ा। इस प्रकार धृष्टद्युम्नकुमारके मारे जानेपर सारी सेनाएँ भयसे काँपने लगीं ॥ ६७ ॥

अथ द्रोणं समारोहच्चेकितानो महाबलः । स द्रोणं दशभिर्विद्ध्वा प्रत्यविध्यत् स्तनान्तरे ॥ ६८ ॥ चतुर्भिः सारथिं चास्य चतुर्भिश्चतुरो हयान् । तदनन्तर महाबली चेकितानने द्रोणाचार्यपर चढ़ाई की। उन्होंने दस बाणोंसे द्रोणको घायल करके उनकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी। साथ ही चार बाणोंसे उनके सारथिको और चार ही बाणोंद्वारा उनके चारों घोड़ोंको भी बींध डाला ॥ ६८ १/२ ॥

तमाचार्यस्त्रिभिर्बाणैर्बाह्वोरुरसि चार्पयत् ॥ ६९ ॥ ध्वजं सप्तभिरुन्मथ्य यन्तारमवधीत् त्रिभिः ।

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