भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 870

वृष्णिवंशके प्रमुख महारथी सात्यकिको भी न देखनेके कारण धर्मराज युधिष्ठिरका एक-एक अंग चिन्ताकी आगसे संतप्त हो उठा ।। ७ ।। नाध्यगच्छत् तदा शान्तिं तावपश्यन् नरोत्तमौ । लोकोपक्रोशभीरुत्वाद् धर्मराजो महामनाः ।। ८ ।। महामनस्वी धर्मराज युधिष्ठिर लोकनिन्दाके डरसे बहुत डरते थे। अतः नरश्रेष्ठ अर्जुन और सात्यकिको न देखनेसे उस समय उन्हें तनिक भी शान्ति नहीं मिली ।। अचिन्तयन्महाबाहुः शैनेयस्य रथं प्रति । पदवीं प्रेषितश्चैव फाल्गुनस्य मया रणे ।। ९ ।। शैनेयः सात्यकिः सत्यो मित्राणामभयंकरः । तदिदं ह्येकमेवासीद् द्विधा जातं ममाद्य वै ।। १० ।। महाबाहु युधिष्ठिर सात्यकिके रथके विषयमें मन-ही-मन इस प्रकार चिन्ता करने लगे—'अहो! मैंने ही रणक्षेत्रमें मित्रोंको अभय देनेवाले सत्यवादी शिनिपौत्र सात्यकिको अर्जुनके मार्गपर जानेके लिये भेजा था। इसलिये यह मेरा हृदय जो पहले एकहीकी चिन्तामें निमग्न था, अब दो व्यक्तियोंके लिये चिन्तित होकर दो भागोंमें बँट गया है ।। ९-१० ।। सात्यकिश्च हि विज्ञेयः पाण्डवश्च धनंजयः । सात्यकिं प्रेषयित्वा तु पाण्डवस्य पदानुगम् ।। ११ ।। सात्वतस्यापि कं युद्धे प्रेषयिष्ये पदानुगम् । 'इस समय सात्यकिका भी पता लगाना चाहिये और पाण्डुपुत्र अर्जुनका भी। मैंने पाण्डुपुत्र अर्जुनके पीछे तो सात्यकिको भेज दिया। अब सात्यकिके पीछे किसको युद्धभूमिमें भेजूँगा? ।। ११ १/२ ।। करिष्यामि प्रयत्नेन भ्रातुरन्वेषणं यदि ।। १२ ।। युयुधानमनन्विष्य लोको मां गर्हयिष्यति । 'यदि मैं युयुधानकी खोज न कराकर प्रयत्नपूर्वक केवल अपने भाई अर्जुनका ही अन्वेषण करूँगा तो संसार मेरी निन्दा करेगा ।। १२ १/२ ।। भ्रातुरन्वेषणं कृत्वा धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।। १३ ।। परित्यजति वार्ष्णेयं सात्यकिं सत्यविक्रमम् । 'सब लोग यही कहेंगे कि धर्मपुत्र युधिष्ठिर अपने भाईकी खोज करके वृष्णिवंशी वीर सत्यपराक्रमी सात्यकिकी उपेक्षा कर रहे हैं ।। १३ १/२ ।। लोकापवादभीरुत्वात् सोऽहं पार्थं वृकोदरम् ।। १४ ।। पदवीं प्रेषयिष्यामि माधवस्य महात्मनः । 'मुझे लोकनिन्दासे बड़ा भय मालूम होता है। अतः कुन्तीनन्दन भीमसेनको मैं महामनस्वी सात्यकिका पता लगानेके लिये भेजूँगा ।। १४ १/२ ।।