महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 879, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंआघ्रातश्च तथा मूर्ध्नि श्रावितश्चाशिषः शुभाः । भारत! उस समय धर्मराज युधिष्ठिरने कुन्तीकुमार भीमसेनको गलेसे लगाया, उसका सिर सूँघा और उन्हें शुभ आशीर्वाद सुनाये ।। १२ १/२ ।। कृत्वा प्रदक्षिणान् विप्रानर्चितांस्तुष्टमानसान् ।। १३ ।। आलभ्य मङ्गलान्यष्टौ पीत्वा कैरातकं मधु । द्विगुणद्रविणो वीरो मदरक्तान्तलोचनः ।। १४ ।। तदनन्तर पूजित एवं संतुष्टचित्त हुए ब्राह्मणोंकी परिक्रमा करके आठ* प्रकारकी मांगलिक वस्तुओंका स्पर्श करनेके पश्चात् भीमसेनने कैरातक मधुका पान किया। फिर तो वीर भीमसेनका बल और उत्साह दुगुना हो गया, उनके नेत्र मदसे लाल हो गये थे ।। १३-१४ ।। विप्रैः कृतस्वस्त्ययनो विजयोत्पादसूचितः । पश्यन्नेवात्मनो बुद्धिं विजयानन्दकारिणीम् ।। १५ ।। उस समय ब्राह्मणोंने स्वस्तिवाचन किया, जिससे विजय-लाभ सूचित होता था। उन्हें अपनी बुद्धि विजयानन्दका अनुभव करती-सी दिखायी दी ।। १५ ।। अनुलोमानिलैश्चाशु प्रदर्शितजयोदयः । भीमसेनो महाबाहुः कवची शुभकुण्डली ।। १६ ।। साङ्गदः सतलत्राणः सरथो रथिनां वरः । अनुकूल हवा चलकर उन्हें शीघ्र ही अवश्यम्भावी विजयकी सूचना देने लगी। रथियोंमें श्रेष्ठ महाबाहु भीमसेन कवच, सुन्दर कुण्डल, बाजूबन्द और तलत्राण (दस्ताने) धारण करके रथपर आरूढ़ हो गये ।। १६ १/२ ।। तस्य कार्ष्णायसं वर्म हेमचित्रं महर्द्धिमत् ।। १७ ।। विबभौ सर्वतः श्लिष्टं सविद्युदिव तोयदः । उनका काले लोहेका बना हुआ सुवर्णजटित बहुमूल्य कवच उनके सारे अंगोंमें सटकर बिजलीसहित मेघके समान सुशोभित हो रहा था ।। १७ १/२ ।। पीतरक्तासितसितैर्वासोभिश्च सुवेष्टितः ।। १८ ।। कण्ठत्राणेन च बभौ सेन्द्रायुध इवाम्बुदः । लाल, पीले, काले और सफेद वस्त्रोंसे अपने शरीरको सुसज्जित करके कण्ठत्राण पहनकर वे इन्द्रधनुषयुक्त मेघके समान शोभा पा रहे थे ।। १८ १/२ ।। प्रयाते भीमसेने तु तव सैन्यं युयुत्सया ।। १९ ।। पाञ्चजन्यरवो घोरः पुनरासीद् विशाम्पते । प्रजानाथ! जब भीमसेन युद्धकी इच्छासे आपकी सेनाकी ओर प्रस्थित हुए, उस समय पुनः पांचजन्य शंखकी भयंकर ध्वनि प्रकट हुई ।। १९ १/२ ।।