भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 881

आहत्य दुन्दुभिं भीमः शङ्खं प्रध्माप्य चासकृत् । विनद्य सिंहनादेन ज्यां विकर्षन् पुनः पुनः ॥ २८ ॥ भीमसेनने बारंबार डंका पीटा और अनेक बार शंख बजाकर बारंबार धनुषकी प्रत्यंचा खींचते हुए सिंहके दहाड़नेके समान भयंकर गर्जना की ॥ २८ ॥

तेन शब्देन वीराणां पातयित्वा मनांस्युत । दर्शयन् घोरमात्मानममित्रान् सहसाभ्ययात् ॥ २९ ॥ उस तुमुल शब्दके द्वारा बड़े-बड़े वीरोंके दिल दहलाकर अपना भयंकर रूप दिखाते हुए उन्होंने सहसा शत्रुओंपर धावा बोल दिया ॥ २९ ॥

तमूहूर्जवना दान्ता विरुवन्तो हयोत्तमाः । विशोकेनाभिसम्पन्ना मनोमारुतरंहसः ॥ ३० ॥ उस समय विशोक नामक सारथिके द्वारा संचालित होनेवाले, मन और वायुके समान वेगशाली तीव्रगामी और सुशिक्षित सुन्दर घोड़े हर्षसूचक शब्द करते हुए उनका भार वहन करते थे ॥ ३० ॥

आरुजन् विरुजन् पार्थो ज्यां विकर्षंश्च पाणिना । सम्पकर्षन् विमर्षंश्च सेनाग्रं समलोडयत् ॥ ३१ ॥ कुन्तीकुमार भीम अपने हाथसे धनुषकी डोरी खींचकर चढ़ाते, उसे भलीभाँति कानतक खींचते, बाणोंकी वर्षा करते तथा शत्रुओंको घायल करके उनके अंग-भंग करते हुए सेनाके अग्रभागको मथे डालते थे ॥ ३१ ॥

तं प्रयान्तं महाबाहुं पञ्चालाः सहसोमकाः । पृष्ठतोऽनुययुः शूरा मघवन्तमिवामराः ॥ ३२ ॥ इस प्रकार यात्रा करते हुए महाबाहु भीमसेनके पीछे पांचाल और सोमक वीर भी चले, मानो देवगण देवराज इन्द्रका अनुसरण कर रहे हों ॥ ३२ ॥

तं समेत्य महाराज तावकाः पर्यवारयन् । दुःशलश्चित्रसेनश्च कुण्डभेदी विविंशतिः ॥ ३३ ॥ दुर्मुखो दुःसहश्चैव विकर्णश्च शलस्तथा । विन्दानुविन्दौ सुमुखो दीर्घबाहुः सुदर्शनः ॥ ३४ ॥ वृन्दारकः सुहस्तश्च सुषेणो दीर्घलोचनः । अभयो रौद्रकर्मा च सुवर्मा दुर्विमोचनः ॥ ३५ ॥ शोभन्तो रथिनां श्रेष्ठाः सहसैन्यपदानुगाः । संयत्ताः समरे वीरा भीमसेनमुपाद्रवन् ॥ ३६ ॥ महाराज! उस समय आपके पुत्रोंने भीमसेनका सामना करके उन्हें रोका। दुःशल, चित्रसेन, कुण्डभेदी, विविंशति, दुर्मुख, दुःसह, विवर्ण, शल, विन्द,