महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 884, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें'तुम हमारे पिता, गुरु और बन्धु हो और हम तुम्हारे पुत्रके तुल्य हैं। हम सब लोग यही मानते हैं और सदा तुम्हारे सामने प्रणतभावसे खड़े होते हैं ।। ५० ।।
अद्य तद्विपरीतं ते वदतोऽस्मासु दृश्यते ।
यदि त्वं शत्रुमात्मानं मन्यसे तत्तथास्त्विह ।। ५१ ।।
एष ते सदृशं शत्रोः कर्म भीमः करोम्यहम् ।
'परंतु आज तुम्हारे मुँहसे जो बात निकल रही है, उससे हमलोगोंपर तुम्हारा विपरीत भाव लक्षित होता है। यदि तुम अपने-आपको शत्रु मानते हो तो ऐसा ही सही। यह मैं भीमसेन तुम्हारे शत्रुके अनुरूप कर्म कर रहा हूँ' ।। ५१ १/२ ।।
अथोद्भ्राम्य गदां भीमः कालदण्डमिवान्तकः ।। ५२ ।।
द्रोणाय व्यसृजद् राजन् स रथादवपुप्लुवे ।
राजन्! ऐसा कहकर भीमसेनने गदा उठा ली, मानो यमराजने कालदण्ड हाथमें ले लिया हो। उन्होंने उस गदाको घुमाकर द्रोणाचार्यपर दे मारा, किंतु द्रोणाचार्य शीघ्र ही रथसे कूद पड़े ।। ५२ १/२ ।।
साश्वसूतध्वजं यानं द्रोणस्यापोथयत् तदा ।। ५३ ।।
प्रामृद्नाच्च बहून् योधान् वायुर्वृक्षानिवौजसा ।
जैसे हवा अपने वेगसे वृक्षोंको उखाड़ फेंकती है, उसी प्रकार उस गदाने उस समय घोड़े, सारथि और ध्वजसहित द्रोणाचार्यके रथको चूर-चूर कर दिया और बहुत-से योद्धाओंको भी धूलमें मिला दिया ।। ५३ १/२ ।।
तं पुनः परिवव्रुस्ते तव पुत्रा रथोत्तमम् ।। ५४ ।।
अन्यं तु रथमास्थाय द्रोणः प्रहरतां वरः ।
व्यूहद्वारं समासाद्य युद्धाय समुपस्थितः ।। ५५ ।।
उस समय उस श्रेष्ठ महारथी वीरको आपके पुत्रोंने पुनः आकर चारों ओरसे घेर लिया। योद्धाओंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्य दूसरे रथपर बैठकर व्यूहके द्वारपर आ पहुँचे और युद्धके लिये उद्यत हो गये ।। ५४-५५ ।।
ततः क्रुद्धो महाराज भीमसेनः पराक्रमी ।
अग्रतः स्यन्दनानीकं शरवर्षैरवाकिरत् ।। ५६ ।।
महाराज! तब क्रोधमें भरे हुए पराक्रमी भीमसेनने सामने खड़ी हुई रथसेनापर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ।।
ते वध्यमानाः समरे तव पुत्रा महारथाः ।
भीमं भीमबला युद्धे योधयन्ति जयैषिणः ।। ५७ ।।
युद्धस्थलमें भयंकर बलशाली विजयाभिलाषी आपके महारथी पुत्र बाणोंकी मार खाकर भी समरांगणमें भीमसेनके साथ युद्ध करते रहे ।। ५७ ।।
ततो दुःशासनः क्रुद्धो रथशक्तिं समाक्षिपत् ।