महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 906, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंतब उस बलवान् भरतवंशी वीर दुर्योधनने तुरंत आगे बढ़कर बड़ी उतावलीके साथ आते हुए उन दोनों भाइयोंके साथ भारी युद्ध छेड़ दिया ॥ २९ ॥ तावेनमभ्यद्रवतामुभावुद्यतकार्मुकौ । महारथसमाख्यातौ क्षत्रियप्रवरौ युधि ॥ ३० ॥ वे दोनों क्षत्रियशिरोमणि विख्यात महारथी वीर थे। उन दोनोंने युद्धस्थलमें धनुष उठाकर दुर्योधनपर धावा बोल दिया ॥ ३० ॥ तमविध्यद् युधामन्युस्त्रिंशता कङ्कपत्रिभिः । विंशत्या सारथिं चास्य चतुर्भिश्चतुरो हयान् ॥ ३१ ॥ युधामन्युने कंकपत्रयुक्त तीस बाणोंद्वारा दुर्योधनको घायल कर दिया। फिर बीस बाणोंसे उसके सारथिको और चारसे चारों घोड़ोंको बींध डाला ॥ ३१ ॥ दुर्योधनो युधामन्योर्ध्वजमेकेषुणाच्छिनत् । एकेन कार्मुकं चास्य चकर्त तनयस्तव ॥ ३२ ॥ तब आपके पुत्र दुर्योधनने एक बाणसे युधामन्युकी ध्वजा काट डाली और एकसे उसके धनुषके दो टुकड़े कर दिये ॥ ३२ ॥ सारथिं चास्य भल्लेन रथनीडादपाहरत् । ततोऽविध्यच्छरैस्तीक्ष्णैश्चतुर्भिश्चतुरो हयान् ॥ ३३ ॥ इतना ही नहीं, एक भल्ल मारकर उसने युधामन्युके सारथिको भी रथकी बैठकसे नीचे गिरा दिया। फिर चार तीखे बाणोंद्वारा उसके चारों घोड़ोंको भी घायल कर दिया ॥ युधामन्युश्च संक्रुद्धः शरांस्त्रिंशतमाहवे । व्यसृजत् तव पुत्रस्य त्वरमाणः स्तनान्तरे ॥ ३४ ॥ इससे युधामन्यु भी कुपित हो उठा। उसने युद्धस्थलमें बड़ी उतावलीके साथ आपके पुत्रकी छातीमें तीस बाण मारे ॥ ३४ ॥ तथोत्तमौजाः संक्रुद्धः शरैर्हेमविभूषितैः । अविध्यत् सारथिं चास्य प्राहिणोद् यमसादनम् ॥ ३५ ॥ इसी प्रकार उत्तमौजाने भी अत्यन्त कुपित हो अपने सुवर्णभूषित बाणोंद्वारा उसके सारथिको गहरी चोट पहुँचायी और उसे यमलोक भेज दिया ॥ ३५ ॥ दुर्योधनोऽपि राजेन्द्र पाञ्चालस्योत्तमौजसः । जघान चतुरोऽश्वांश्चानुभौ तौ पार्ष्णिसारथी ॥ ३६ ॥ राजेन्द्र! तब दुर्योधनने भी पांचालराज उत्तमौजाके चारों घोड़ों और दोनों पार्श्वरक्षकोंको सारथिसहित मार डाला ॥ ३६ ॥ उत्तमौजा हताश्वस्तु हतसूतश्च संयुगे । आरुरोह रथं भ्रातुर्युधामन्योरभित्वरन् ॥ ३७ ॥