भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 911

अनेकान् विप्रकारांश्च सूतपुत्रसमुद्भवान् । स्मरमाणः कथं भीमो युयुधे सूतसूनुना ॥ १५ ॥ सूतपुत्रके द्वारा किये गये अनेक अपकारोंको स्मरण करके भीमसेनने उसके साथ किस तरह युद्ध किया? ।। १५ ।। योऽजयत् पृथिवीं सर्वां रथेनैकेन वीर्यवान् । तं सूततनयं युद्धे कथं भीमो ह्ययोधयत् ॥ १६ ॥ जिस पराक्रमी वीरने एकमात्र रथकी सहायतासे सारी पृथ्वीको जीत लिया, उस सूतपुत्रके साथ रणभूमिमें भीमसेनने किस तरह युद्ध किया? ।। १६ ।। यो जातः कुण्डलाभ्यां च कवचेन सहैव च । तं सूतपुत्रं समरे भीमः कथमयोधयत् ॥ १७ ॥ जो जन्मसे ही कवच और कुण्डलोंके साथ उत्पन्न हुआ था, उस सूतपुत्रके साथ समरांगणमें भीमसेनने किस प्रकार युद्ध किया? ।। १७ ।। यथा तयोर्युद्धमभूद् यश्चासीद् विजयी तयोः । तन्ममाचक्ष्व तत्त्वेन कुशलो ह्यसि संजय ॥ १८ ॥ संजय! उन दोनों वीरोंमें जिस प्रकार युद्ध हुआ और उनमेंसे जिस एकको विजय प्राप्त हुई, उसका वह सब समाचार मुझे ठीक-ठीक बताओ; क्योंकि तुम इस कार्यमें कुशल हो ।। १८ ।।

संजय उवाच

भीमसेनस्तु राधेयमुत्सृज्य रथिनां वरम् । इयेष गन्तुं यत्रास्तां वीरौ कृष्णधनंजयौ ॥ १९ ॥ संजयने कहा—राजन्! भीमसेनने रथियोंमें श्रेष्ठ राधापुत्र कर्णको छोड़कर वहाँ जानेकी इच्छा की जहाँ वीर श्रीकृष्ण और अर्जुन विद्यमान थे ।। १९ ।। तं प्रयान्तमभिद्रुत्य राधेयः कङ्कपत्रिभिः । अभ्यवर्षन्महाराज मेघो वृष्ट्येव पर्वतम् ॥ २० ॥ महाराज! वहाँसे जाते हुए भीमसेनपर आक्रमण करके राधापुत्र कर्णने उनके ऊपर कंकपत्रयुक्त बाणोंकी उसी प्रकार वर्षा आरम्भ कर दी, जैसे बादल पर्वतपर जलकी वर्षा करता है ।। २० ।। फुल्लता पङ्कजेनेव वक्त्रेण विहसन् बली । आजुहाव रणे यान्तं भीममाधिरथिस्तदा ॥ २१ ॥ बलवान् अधिरथपुत्रने खिलते हुए कमलके समान मुखसे हँसकर जाते हुए भीमसेनको युद्धके लिये ललकारा ।। २१ ।।

कर्ण उवाच