महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 92, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंतमिष्वस्त्रधराचार्यं द्रोणं शंससि मे हतम् ॥ ७ ॥ जिन वीर सेनापतियोंमें चार प्रकारके अस्त्र प्रतिष्ठित थे, उन धनुर्धरोंके आचार्य द्रोणको तुम मुझे मारा गया बता रहे हो ॥ ७ ॥
श्रुत्वा हतं रुक्मरथं वैयाघ्रपरिवारितम् । जातरूपशिरस्त्राणं नाद्य शोकमपानुदे ॥ ८ ॥ व्याघ्रचर्मसे आच्छादित सुवर्णमय रथपर आरूढ़ हो सुनहरा शिरस्त्राण (टोप या पगड़ी) धारण करनेवाले द्रोणाचार्यको मारा गया सुनकर आज मैं अपने शोकको किसी प्रकार दूर नहीं कर पाता हूँ ॥ ८ ॥
न नूनं परदुःखेन म्रियते कोऽपि संजय । यत्र द्रोणमहं श्रुत्वा हतं जीवामि मन्दधीः ॥ ९ ॥ संजय! निश्चय ही कोई भी दूसरेके दुःखसे नहीं मरता है, तभी तो मैं मन्दबुद्धि मनुष्य द्रोणाचार्यको मारा गया सुनकर भी जी रहा हूँ ॥ ९ ॥
दैवमेव परं मन्ये नन्वर्थं हि पौरुषम् । अश्मसारमयं नूनं हृदयं सुदृढं मम ॥ १० ॥ यच्छ्रुत्वा निहतं द्रोणं शतधा न विदीर्यते । मैं तो दैवको ही श्रेष्ठ मानता हूँ। पुरुषार्थ तो अनर्थका ही कारण है। निश्चय ही मेरा यह अत्यन्त सुदृढ़ हृदय लोहेका बना हुआ है, जिससे द्रोणाचार्यको मारा गया सुनकर भी इसके सौ टुकड़े नहीं हो जाते ॥ १० १/२ ॥
ब्राह्मे दैवे तथैष्वस्त्रे यमुपासन् गुणार्थिनः ॥ ११ ॥ ब्राह्मणा राजपुत्राश्च स कथं मृत्युना हतः । गुणार्थी ब्राह्मण तथा राजकुमार ब्राह्म और दैव अस्त्रोंके लिये जिनकी उपासना करते थे, उन्हें मृत्यु कैसे हर ले गयी? ॥ ११ १/२ ॥
शोषणं सागरस्येव मेरोरिव विसर्पणम् ॥ १२ ॥ पतनं भास्करस्येव न मृष्ये द्रोणपातनम् । द्रोणका रणभूमिमें गिराया जाना समुद्रके सूखने, मेरु पर्वतके चलने-फिरने और सूर्यके आकाशसे टूटकर गिरनेके समान है। मैं इसे किसी प्रकार सहन नहीं कर पाता ॥ १२ १/२ ॥
दुष्टानां प्रतिषेद्धाऽऽसीद् धार्मिकाणां च रक्षिता ॥ १३ ॥ योऽहासीत् कृपणस्यार्थे प्राणानपि परंतपः । शत्रुओंको संताप देनेवाले द्रोणाचार्य दुष्टोंको दण्ड देनेवाले और धार्मिकोंके रक्षक थे। उन्होंने मुझ कृपणके लिये अपने प्राणतक दे दिये ॥ १३ १/२ ॥
मन्दानां मम पुत्राणां जयाशा यस्य विक्रमे ॥ १४ ॥ बृहस्पत्युशनस्तुल्यो बुद्ध्या स निहतः कथम् ।