भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 920

व्याघ्राविव सुसंरब्धौ श्येनाविव च शीघ्रगौ । शरभाविव संक्रुद्धौ युयुधाते परस्परम् ॥ ११ ॥ वे दो व्याघ्रोंके समान रोषावेशमें भरकर दो बाजोंके समान परस्पर शीघ्रतापूर्वक झपटते थे तथा अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए दो शरभोंके समान परस्पर युद्ध करते थे ॥ ११ ॥ ततो भीमः स्मरन् क्लेशानक्षद्यूते वनेऽपि च । विराटनगरे चैव दुःखं प्राप्तमरिंदमः ॥ १२ ॥ राष्ट्राणां स्फीतरत्नानां हरणं च तवात्मजैः । सततं च परिक्लेशान् सपुत्रेण त्वया कृतान् ॥ १३ ॥ दग्धुमैच्छच्च यः कुन्तीं सपुत्रां त्वमनागसम् । कृष्णायाश्च परिक्लेशं सभामध्ये दुरात्मभिः ॥ १४ ॥ केशपक्षग्रहं चैव दुःशासनकृतं तथा । परुषाणि च वाक्यानि कर्णेनोक्तानि भारत ॥ १५ ॥ पतिमन्यं परीप्सस्व न सन्ति पतयस्तव । पतिता नरके पार्थाः सर्वे षण्ढतिलोपमाः ॥ १६ ॥ समक्षं तव कौरव्य यदूचुः कौरवास्तदा । दासीभावेन कृष्णां च भोक्तुकामाः सुतास्तव ॥ १७ ॥ यच्चापि तान् प्रव्रजतः कृष्णाजिननिवासिनः । परुषाण्युक्तवान् कर्णः सभायां संनिधौ तव ॥ १८ ॥ तृणीकृत्य यथा पार्थांस्तव पुत्रो ववल्ग ह । विषमस्थान् समस्थो हि संरब्धो गतचेतनः ॥ १९ ॥ बाल्यात् प्रभृति चारिघ्नः स्वानि दुःखानि चिन्तयन् । निरविद्यत धर्मात्मा जीवितेन वृकोदरः ॥ २० ॥ जूआके समय, वनवासकालमें तथा विराटनगरमें जो दुःख प्राप्त हुआ था, उसका स्मरण करके, आपके पुत्रोंने जो पाण्डवोंके राज्यों तथा समुज्ज्वल रत्नोंका अपहरण किया था, उसे याद करके, पुत्रोंसहित आपने पाण्डवोंको जो निरन्तर क्लेश प्रदान किये हैं, उन्हें ध्यानमें लाकर निरपराध कुन्तीदेवी तथा उनके पुत्रोंको जो आपने जला डालनेकी इच्छा की थी, सभाके भीतर आपके दुरात्मा पुत्रोंने जो द्रौपदीको महान् कष्ट पहुँचाया था, दुःशासनने जो उसके केश पकड़े थे, भारत! कर्णने जो उसके प्रति कठोर वचन सुनाये थे तथा कुरुनन्दन! आपकी आँखोंके सामने ही कौरवोंने जो द्रौपदीसे यह कहा था कि 'कृष्णे! तू दूसरा पति कर ले, तेरे ये पति अब नहीं रहे, कुन्तीके सभी पुत्र थोथे तिलोंके समान निर्वीर्य होकर नरक (दुःख)-में पड़ गये हैं।' महाराज! आपके पुत्र जो द्रौपदीको दासी बनाकर उसका उपभोग करना चाहते थे तथा काले मृगचर्म धारण करके वनकी ओर प्रस्थान करते समय पाण्डवोंके प्रति सभामें आपके समीप ही कर्णने जो कटुवचन सुनाये थे और