भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 933

वहाँ हमलोगोंने राधानन्दन कर्णका अद्भुत पराक्रम देखा। रथियोंमें श्रेष्ठ उस वीरने रथहीन होनेपर भी अपने शत्रुको आगे नहीं बढ़ने दिया॥ १४ १/२ ॥
विरथं तं नरश्रेष्ठं दृष्ट्वाऽऽधिरथिमाहवे॥ १५॥
दुर्योधनस्ततो राजन्नभ्यभाषत दुर्मुखम्।
एष दुर्मुख राधेयो भीमेन विरथीकृतः॥ १६॥
तं रथेन नरश्रेष्ठं सम्पादय महारथम्।
राजन्! नरश्रेष्ठ कर्णको युद्धस्थलमें रथहीन खड़ा देख दुर्योधनने अपने भाई दुर्मुखसे कहा—‘दुर्मुख! यह राधानन्दन कर्ण भीमसेनके द्वारा रथसे वंचित कर दिया गया है। इस महारथी नरश्रेष्ठ वीरको रथसे सम्पन्न करो’॥ १५-१६ १/२ ॥
ततो दुर्योधनवचः श्रुत्वा भारत दुर्मुखः॥ १७॥
त्वरमाणोऽभ्ययात् कर्णं भीमं चावारयच्छरैः।
दुर्मुखं प्रेक्ष्य संग्रामे सूतपुत्रपदानुगम्॥ १८॥
वायुपुत्रः प्रहृष्टोऽभूत् सृक्किणी परिसंलिहन्।
भरतनन्दन! दुर्योधनकी यह बात सुनकर दुर्मुख बड़ी उतावलीके साथ कर्णके समीप आ पहुँचा और भीमसेनको अपने बाणोंद्वारा रोका। संग्राममें सूतपुत्रके चरणोंका अनुसरण करनेवाले दुर्मुखको देखकर वायुपुत्र भीमसेन बड़े प्रसन्न हुए। वे अपने दोनों गलफर चाटने लगे॥
ततः कर्णं महाराज वारयित्वा शिलीमुखैः॥ १९॥
दुर्मुखाय रथं तूर्णं प्रेषयामास पाण्डवः।
महाराज! तदनन्तर कर्णको अपने बाणोंद्वारा रोककर पाण्डुकुमार भीम तुरंत ही अपने रथको दुर्मुखके पास ले गये॥ १९ १/२ ॥
तस्मिन् क्षणे महाराज नवभिर्नतपर्वभिः॥ २०॥
सुमुखैर्दुर्मुखं भीमः शरैर्निन्ये यमक्षयम्।
राजन्! फिर झुकी हुई गाँठवाले नौ सुमुख बाणोंद्वारा भीमसेनने दुर्मुखको उसी क्षण यमलोक पहुँचा दिया॥ २० १/२ ॥
ततस्तमेवाधिरथिः स्यन्दनं दुर्मुखे हते॥ २१॥
आस्थितः प्रबभौ राजन् दीप्यमान इवांशुमान्।
नरेश्वर! दुर्मुखके मारे जानेपर कर्ण उसी रथपर बैठकर देदीप्यमान सूर्यके समान प्रकाशित होने लगा॥
शयानं भिन्नमर्माणं दुर्मुखं शोणितोक्षितम्॥ २२॥
दृष्ट्वा कर्णोऽश्रुपूर्णाक्षो मुहूर्तं नाभ्यवर्तत।
तं गतासुमतिक्रम्य कृत्वा कर्णः प्रदक्षिणम्॥ २३॥
दीर्घमुष्णं श्वसन् वीरो न किंचित् प्रत्यपद्यत।