महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 954, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंततो हृष्टमना राजन् वादित्राणां महास्वनैः । सिंहनादरवं भ्रातुः प्रतिजग्राह पाण्डवः ॥ ३९ ॥ राजन्! तब प्रसन्नचित्त होकर युधिष्ठिरने वाद्योंकी गम्भीर ध्वनिके द्वारा भाईके उस सिंहनादको स्वागतपूर्वक ग्रहण किया ॥ ३९ ॥ हर्षेण महता युक्तः कृतसंज्ञो वृकोदरे । अभ्ययात् समरे द्रोणं सर्वशस्त्रभृतां वरः ॥ ४० ॥ इस प्रकार भीमसेनको अपनी प्रसन्नताका संकेत करके सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरने बड़े हर्षके साथ रणभूमिमें द्रोणाचार्यपर आक्रमण किया ॥ ३९ ॥ एकत्रिंशन्महाराज पुत्रांस्तव निपातितान् । हतान् दुर्योधनो दृष्ट्वा क्षत्तुः सस्मार तद् वचः ॥ ४१ ॥ महाराज! आपके इकतीस (दुःशलको लेकर बत्तीस) पुत्रोंको मारा गया देखकर दुर्योधनको विदुरजीकी कही हुई बात याद आ गयी ॥ ४१ ॥ तदिदं समनुप्राप्तं क्षत्तुर्निःश्रेयसं वचः । इति संचिन्त्य ते पुत्रो नोत्तरं प्रत्यपद्यत ॥ ४२ ॥ विदुरजीने जो कल्याणकारी वचन कहा था, उसके अनुसार ही यह संकट प्राप्त हुआ है। ऐसा सोचकर आपके पुत्रसे कोई उत्तर देते न बना ॥ ४२ ॥ यद् द्यूतकाले दुर्बुद्धिर्ब्रवीत् तनयस्तव । सभामानाय्य पाञ्चालीं कर्णेन सहितोऽल्पधीः ॥ ४३ ॥ यच्च कर्णोऽब्रवीत् कृष्णां सभायां परुषं वचः । प्रमुखे पाण्डुपुत्राणां तव चैव विशाम्पते ॥ ४४ ॥ शृण्वतस्तव राजेन्द्र कौरवाणां च सर्वशः । विनष्टाः पाण्डवाः कृष्णे शाश्वतं नरकं गताः ॥ ४५ ॥ पतिमन्यं वृणीष्वेति तस्येदं फलमागतम् । द्यूतके समय कर्णके साथ आपके मन्दमति पुत्र दुर्बुद्धि दुर्योधनने पांचालराजकुमारी द्रौपदीको सभामें बुलाकर उसके प्रति जो दुर्वचन कहा था तथा प्रजानाथ! महाराज! पाण्डवों और आपके सामने समस्त कौरवोंके सुनते हुए कर्णने सभामें द्रौपदीके प्रति जो यह कठोर वचन कहा था कि 'कृष्णे! पाण्डव नष्ट हो गये। सदाके लिये नरकमें पड़ गये। तू दूसरा पति कर ले', उसी अन्यायका आज यह फल प्राप्त हुआ है ॥ ४३-४५ १/२ ॥ यच्च षण्ढतिलादीनि परुषाणि तवात्मजैः । श्रावितास्ते महात्मानः पाण्डवाः कोपयिष्णुभिः ॥ ४६ ॥ तं भीमसेनः क्रोधाग्निं त्रयोदश समाः स्थितम् । उद्गिरंस्तव पुत्राणामन्तं गच्छति पाण्डवः ॥ ४७ ॥