भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 96, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 96

कथं संजय दुर्धर्षमनाधृष्यशोबलम् ॥ ३७ ॥ पश्यतां पुरुषेन्द्राणां समरे पार्षतोऽवधीत् । संजय! जिनके यश और बलका तिरस्कार होना असम्भव था, उन दुर्धर्ष वीर द्रोणाचार्यको समरभूमिमें सम्पूर्ण नरेशोंके देखते-देखते धृष्टद्युम्नने कैसे मार डाला? ॥

के पुरस्तादयुध्यन्त रक्षन्तो द्रोणमन्तिकात् ॥ ३८ ॥ के नु पश्चादवर्तन्त गच्छन्तो दुर्गमां गतिम् । कौन-कौनसे वीर उस समय निकटसे द्रोणाचार्यकी रक्षा करते हुए उनके आगे रहकर युद्ध करते थे और कौन-कौन योद्धा दुर्गम मार्गपर पैर बढ़ाते हुए उनके पीछे रहकर रक्षा करते थे? ॥ ३८ १/२ ॥

केऽरक्षन् दक्षिणं चक्रं सव्यं के च महात्मनः ॥ ३९ ॥ पुरस्तात् के च वीरस्य युध्यमानस्य संयुगे । के च तस्मिंस्तनूंस्त्यक्त्वा प्रतीपं मृत्युमाव्रजन् ॥ ४० ॥ कौन वीर उन महात्माके दाहिने पहियेकी और कौन बायें पहियेकी रक्षा करते थे? कौन उस युद्धस्थलमें युद्धपरायण वीरवर द्रोणाचार्यके आगे थे और किन लोगोंने अपने शरीरका मोह छोड़कर विपक्षियोंका सामना करते हुए उस रणक्षेत्रमें मृत्युका वरण किया था ॥ ३९-४० ॥

द्रोणस्य समरे वीराः केऽकुर्वन्त परां धृतिम् । कच्चिन्नैनं भयान्मन्दाः क्षत्रिया व्यजहन् रणे ॥ ४१ ॥ रक्षितारस्ततः शून्ये कच्चित् तैर्न हतः परैः । किन वीरोंने युद्धमें द्रोणाचार्यको उत्तम धैर्य प्रदान किया? उनकी रक्षा करनेवाले मूर्ख क्षत्रियोंने भयभीत होकर युद्धस्थलमें उन्हें अकेला तो नहीं छोड़ दिया? और इस प्रकार शत्रुओंने सूनेमें तो उन्हें नहीं मार डाला? ॥ ४१ १/२ ॥

न स पृष्ठमरेस्त्रासाद् रणे शौर्यात् प्रदर्शयेत् ॥ ४२ ॥ परामप्यापदं प्राप्य स कथं निहतः परैः । जो बड़ी-से-बड़ी आपत्ति पड़नेपर भी रणमें अपने शौर्यके कारण शत्रुको भयवश पीठ नहीं दिखा सकते थे, वे विपक्षियोंद्वारा किस प्रकार मारे गये? ॥ ४२ १/२ ॥

एतदार्येण कर्तव्यं कृच्छ्रास्वापत्सु संजय ॥ ४३ ॥ पराक्रमेद् यथाशक्त्या तच्च तस्मिन् प्रतिष्ठितम् । संजय! बड़े भारी संकटमें पड़नेपर श्रेष्ठ पुरुषको यही करना चाहिये कि वह यथाशक्ति पराक्रम दिखावे; यह बात द्रोणाचार्यमें पूर्णरूपसे प्रतिष्ठित थी ॥ ४३ १/२ ॥

मुह्यते मे मनस्तात कथा तावन्निवार्यताम् । भूयस्तु लब्धसंज्ञस्त्वां परिपृच्छामि संजय ॥ ४४ ॥

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