महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 960, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंमाननीय भरतनन्दन! इधर-उधर पड़े हुए सोनेके अंगद, हार, कुण्डल, मुकुट, वलय, अंगूठी, चूड़ामणि, उष्णीष, सुवर्णमय सूत्र, कवच, दस्ताने, हार, निष्क, वस्त्र, छत्र, टूटे हुए चँवर, व्यजन, विदीर्ण हुए हाथी, घोड़े, मनुष्य, खूनसे लथपथ हुए पंखयुक्त बाण आदि नाना प्रकारकी छिन्न-भिन्न, पतित और फेंकी हुई वस्तुओंसे वहाँकी भूमि ग्रहोंसे आकाशकी भाँति सुशोभित हो रही थी॥ २१—२४ १/२॥
अचिन्त्यमद्भुतं चैव तयोः कर्मातिमानुषम् ॥ २५ ॥ दृष्ट्वा चारणसिद्धानां विस्मयः समजायत ।
उन दोनोंके उस अचिन्त्य, अलौकिक और अद्भुत कर्मको देखकर चारणों और सिद्धोंके मनमें भी महान् विस्मय हो गया॥ २५ १/२॥
अग्नेर्वायुसहायस्य गतिः कक्ष इवाहवे ॥ २६ ॥ आसीद् भीमसहायस्य रौद्रमाधिरथेर्गतम् ।
जैसे वायुकी सहायता पाकर सूखे वनमें तथा घास-फूसमें अग्निकी गति बढ़ जाती है, उसी प्रकार उस महायुद्धमें भीमसेनके साथ सूतपुत्र कर्णकी भयंकर गति बढ़ गयी थी॥ २६ १/२॥
निपातितध्वजरथं हतवाजिनरद्विपम् ॥ २७ ॥ गजाभ्यां सम्प्रयुक्ताभ्यामासीन्नलवनं यथा । मेघजालनिभं सैन्यमासीत् तव नराधिप ॥ २८ ॥ विमर्दः कर्णभीमाभ्यामासीच्च परमो रणे ।
नरेश्वर! जैसे दो हाथी किसीसे प्रेरित होकर नरकुलके वनको रौंद डालते हैं, उसी प्रकार मेघोंकी घटाके समान आपकी सेना बड़ी दुरवस्थामें पड़ गयी थी। उसके रथ और ध्वज गिराये जा चुके थे। हाथी, घोड़े और मनुष्य मारे गये थे। कर्ण और भीमसेनने उस युद्धस्थलमें महान् संहार मचा रखा था॥ २७-२८ १/२॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि भीमकर्णयुद्धे अष्टात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें भीम और कर्णका युद्धविषयक एक सौ अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १३८॥