महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 971, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंतं च दृष्ट्वा रथोपस्थे निलीनं व्यथितेन्द्रियम् ।। ७६ ।। ध्वजमस्य समासाद्य तस्थौ भीमो महीतले । कर्णकी सारी इन्द्रियाँ व्यथित हो गयी थीं। वह रथके पिछले भागमें दुबक गया था। उसे उस अवस्थामें देखकर भीमसेन उसके ध्वजका सहारा लेकर पृथ्वीपर खड़े हो गये ।। ७६ १/२ ।।
तदस्य कुरवः सर्वे चारणाश्चाभ्यपूजयन् ।। ७७ ।। यदियेष रथात् कर्णं हर्तुं तार्क्ष्य इवोरगम् । जैसे गरुड़ सर्पको दबोच लेते हैं, उसी प्रकार भीमसेनने कर्णको उसके रथसे पकड़ ले जानेकी जो इच्छा की थी, उनके इस कर्मकी समस्त कौरवों तथा चारणोंने भी प्रशंसा की ।। ७७ १/२ ।।
स च्छिन्नधन्वा विरथः स्वधर्ममनुपालयन् ।। ७८ ।। स्वरथं पृष्ठतः कृत्वा युद्धायैव व्यवस्थितः । धनुष कट जाने तथा रथहीन होनेपर भी स्वधर्मका पालन करते हुए भीमसेन अपने रथको पीछे करके युद्धके लिये ही खड़े रहे ।। ७८ १/२ ।।