भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 989

‘फाल्गुन! यह शूरवीर एवं उत्तम अस्त्रोंका ज्ञाता सात्यकि धर्मराजके प्रिय तुम्हारे समाचार लेनेके लिये बड़े-बड़े योद्धाओंको मारकर यहाँ आ रहा है ।। १७ ।। कृत्वा सुदुष्करं कर्म सैन्यमध्ये महाबलः । तव दर्शनमन्विच्छन् पाण्डवाभ्येति सात्यकिः ॥ १८ ॥ ‘पाण्डुनन्दन! महाबली सात्यकि कौरव-सेनाके भीतर अत्यन्त दुष्कर पराक्रम करके तुम्हें देखनेकी इच्छासे यहाँ आ रहा है ।। १८ ।। बहूनेकरथेनाजौ योधयित्वा महारथान् । आचार्यप्रमुखान् पार्थ प्रयात्येष स सात्यकिः ॥ १९ ॥ ‘पार्थ! युद्धस्थलमें द्रोणाचार्य आदि बहुत-से महारथियोंके साथ एकमात्र रथकी सहायतासे युद्ध करके यह सात्यकि इधर आ रहा है ।। १९ ।। स्वबाहुबलमाश्रित्य विदार्य च वरूथिनीम् । प्रेषितो धर्मराजेन पार्थैषोऽभ्येति सात्यकिः ॥ २० ॥ ‘कुन्तीकुमार! अपने बाहुबलका आश्रय ले कौरव-सेनाको विदीर्ण करके धर्मराजका भेजा हुआ यह सात्यकि यहाँ आ रहा है ।। २० ।। यस्य नास्ति समो योधः कौरवेषु कथंचन । सोऽयमायाति कौन्तेय सात्यकिर्युद्धदुर्मदः ॥ २१ ॥ ‘कुन्तीनन्दन! कौरव-सेनामें किसी प्रकार भी जिसकी समता करनेवाला एक भी योद्धा नहीं है, वही यह रणदुर्मद सात्यकि यहाँ आ रहा है ।। २१ ।। कुरुसैन्याद् विमुक्तो वै सिंहो मध्याद् गवामिव । निहत्य बहुलाः सेनाः पार्थैषोऽभ्येति सात्यकिः ॥ २२ ॥ ‘पार्थ! जैसे सिंह गायोंके बीचसे अनायास ही निकल जाता है, उसी प्रकार कौरव-सेनाके घेरेसे छूटकर निकला हुआ यह सात्यकि बहुत-सी शत्रु-सेनाओंका संहार करके इधर आ रहा है ।। २२ ।। एष राजसहस्राणां वक्त्रैः पङ्कजसंनिभैः । आस्तीर्य वसुधां पार्थ क्षिप्रमायाति सात्यकिः ॥ २३ ॥ ‘कुन्तीनन्दन! यह सात्यकि सहस्रों राजाओंके कमलसदृश मस्तकोंद्वारा इस रणभूमिको पाटकर शीघ्रतापूर्वक इधर आ रहा है ।। २३ ।। एष दुर्योधनं जित्वा भ्रातृभिः सहितं रणे । निहत्य जलसंधं च क्षिप्रमायाति सात्यकिः ॥ २४ ॥ ‘यह सात्यकि रणभूमिमें भाइयोंसहित दुर्योधनको जीतकर और जलसंधका वध करके शीघ्र यहाँ आ रहा है ।। २४ ।। रुधिरौघवतीं कृत्वा नदीं शोणितकर्दमाम् । तृणवद् व्यस्य कौरव्यानेष ह्यायाति सात्यकिः ॥ २५ ॥