भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 99

यः स उद्यन्निवादित्यो ज्योतिषा प्रणदंस्तमः । अजातशत्रुमायान्तं कस्तं द्रोणादवारयत् ॥ ७ ॥ **धृतराष्ट्र बोले—**जो उगते हुए सूर्यकी भाँति अपनी प्रभासे अन्धकार दूर कर देते हैं, उन अजातशत्रु युधिष्ठिरको द्रोणके समीप आनेसे किसने रोका था? ॥ ७ ॥

प्रभिन्नमिव मातङ्गं यथा क्रुद्धं तरस्विनम् । प्रसन्नवदनं दृष्ट्वा प्रतिद्विरदगामिनम् ॥ ८ ॥ वासितासंगमे यद्वदजय्यं प्रति यूथपैः । निजघान रणे वीरान् वीरः पुरुषसत्तमः ॥ ९ ॥ यो ह्येको हि महावीर्यो निर्दहेद् घोरचक्षुषा । कृत्स्नं दुर्योधनबलं धृतिमान् सत्यसंगरः ॥ १० ॥ चक्षुर्हणं जये सक्तमिष्वासधरमच्युतम् । दान्तं बहुमतं लोके के शूराः पर्यवारयन् ॥ ११ ॥ जो मदकी धारा बहानेवाले, हथिनीके साथ समागमके समय आये हुए विपक्षी हाथीपर आक्रमण करनेवाले तथा गजयूथपतियोंके लिये अजेय मतवाले गजराजके समान वेगशाली और पराक्रमी हैं, कौरवोंके प्रति जिनका क्रोध बढ़ा हुआ है, जिन पुरुषप्रवर वीरने रणक्षेत्रमें बहुत-से वीरोंका संहार किया है, जो महापराक्रमी, धैर्यवान् एवं सत्यप्रतिज्ञ हैं और अपनी भयंकर दृष्टिसे अकेले ही दुर्योधनकी सम्पूर्ण सेनाको भस्म कर सकते हैं, जो क्रोधभरी दृष्टिसे ही शत्रुा संहार करनेमें समर्थ हैं, विजयके लिये प्रयत्नशील, अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले, जितेन्द्रिय तथा लोकमें विशेष सम्मानित हैं, उन प्रसन्नवदन धनुर्धर युधिष्ठिरको द्रोणाचार्यके सामने आते देख मेरे पक्षके किन शूरवीरोंने रोका था? ॥ ८—११ ॥

के दुष्प्रधर्षं राजानमिष्वासधरमच्युतम् । समासेदुर्नरव्याघ्रं कौन्तेयं तत्र मामकाः ॥ १२ ॥ जो धर्मसे कभी विचलित नहीं होते हैं, उन महाधनुर्धर दुर्धर्ष वीर पुरुषसिंह कुन्तीकुमार राजा युधिष्ठिरपर मेरे किन योद्धाओंने आक्रमण किया था? ॥ १२ ॥

तरसैवाभिपद्याथ यो वै द्रोणमुपाद्रवत् । यः करोति महत् कर्म शत्रूणां वै महाबलः ॥ १३ ॥ महाकायो महोत्साहो नागायुतसमो बले । तं भीमसेनमायान्तं के शूराः पर्यवारयन् ॥ १४ ॥ जिन्होंने वेगसे ही पहुँचकर द्रोणाचार्यपर आक्रमण किया था, जो शत्रुके समक्ष महान् पराक्रम प्रकट करते हैं, जो महाबली, महाकाय और महान् उत्साही हैं तथा जिनमें दस हजार हाथियोंके समान बल है, उन भीमसेनको आते देख किन वीरोंने रोका था? ॥ १३-१४ ॥