महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजिस योगीके लिये सुख और दुःख दोनों समान हैं, वह उन दोनोंके कारणरूप पुण्य और पापको जीत लेता है या नहीं। महर्षे! आप हमारे समक्ष पुण्यके फलका वर्णन करें और यह भी बतावें कि धर्मात्मा पुरुष अपने पापोंका नाश कैसे करता है?' ।। ३२-३३ ।।
बृहस्पतिरुवाच
कृत्वा पापं पूर्वमबुद्धिपूर्वं पुण्यानि चेत्कुरुते बुद्धिपूर्वम् । स तत् पापं नुदते कर्मशीलो वासो यथा मलिनं क्षारयुक्तम् ।। ३४ ।। **बृहस्पतिजीने कहा—**यदि मनुष्य पहले बिना जाने पाप करके फिर जान-बूझकर पुण्यकर्मोंका अनुष्ठान करता है तो वह सत्कर्मपरायण पुरुष अपने पापको उसी प्रकार दूर कर देता है, जैसे क्षार (सोडा, साबुन आदि) लगानेसे कपड़े का मैल छूट जाता है ।। ३४ ।। पापं कृत्वाभिमन्येत नाहमस्मीति पूरुषः । तच्चिकीर्षति कल्याणं श्रद्दधानोऽनसूयकः ।। ३५ ।। मनुष्यको चाहिये कि वह पाप करके अहंकार न प्रकट करे—हेकड़ी न दिखाये, अपितु श्रद्धापूर्वक दोषदृष्टिका परित्याग करके कल्याणमय धर्मके अनुष्ठानकी इच्छा करे ।। ३५ ।। छिद्राणि विवृतान्येव साधूनां चावृणोति यः । यः पापं पुरुषः कृत्वा कल्याणमभिपद्यते ।। ३६ ।। जो मनुष्य श्रेष्ठ पुरुषोंके खुले हुए छिद्रोंको ढकता है अर्थात् उनके प्रकट हुए दोषोंको भी छिपानेकी चेष्टा करता है तथा जो पाप करके उससे विरत हो कल्याणमय कर्ममें लग जाता है, वे दोनों ही पापरहित हो जाते हैं ।। ३६ ।। यथाऽऽदित्यः प्रातरुद्यंस्तमः सर्वं व्यपोहति । कल्याणमाचरन्नेवं सर्वपापं व्यपोहति ।। ३७ ।। जैसे सूर्य प्रातःकाल उदित होकर सारे अन्धकारको नष्ट कर देता है उसी प्रकार शुभकर्मका आचरण करनेवाला पुरुष अपने सभी पापोंका अन्त कर देता है ।। ३७ ।।
भीष्म उवाच
एवमुक्त्वा तु राजानमिन्द्रोतो जनमेजयम् । याजयामास विधिवत् वाजिमेधेन शौनकः ।। ३८ ।। **भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! ऐसा कहकर शौनक इन्द्रोतने राजा जनमेजयसे विधिपूर्वक अश्वमेधयज्ञका अनुष्ठान कराया ।। ३८ ।। ततः स राजा व्यपनीतकल्मषः श्रेयोवृत्तः प्रज्वलिताग्निरूपवान् । विवेश राज्यं स्वममित्रकर्षणो