भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1007

धन, गाय, सोना, मणि, रत्न, और पुत्र-इन सबका मूल कारण तप ही है। तपस्याके योगसे ही इनकी उपलब्धि होती है ॥ ३६ ॥ यथाकृता च भूतेषु प्राप्यते सुखदुःखिता । गृहीत्वा जायते जन्तुर्दुःखानि च सुखानि च ॥ ३७ ॥ जीव अपने पूर्वजन्मके कर्मोंके अनुसार दुःख-सुखको लेकर ही जन्म ग्रहण करता है। सभी प्राणियोंमें सुख और दुःखका भोग कर्मानुसार ही प्राप्त होता है ॥ न कर्मणा पितुः पुत्रः पिता वा पुत्रकर्मणा । मार्गेणान्येन गच्छन्ति बद्धाः सुकृतदुष्कृतैः ॥ ३८ ॥ पिताके कर्मसे पुत्रका और पुत्रके कर्मसे पिताका कोई सम्बन्ध नहीं है। अपने-अपने पाप-पुण्यके बन्धनमें बँधे हुए जीव कर्मानुसार विभिन्न मार्गसे जाते हैं ॥ ३८ ॥ धर्मं चरत यत्नेन न चाधर्मे मनः कृथाः । वर्तध्वं च यथाकालं दैवतेषु द्विजेषु च ॥ ३९ ॥ तुमलोग यत्नपूर्वक धर्मका आचरण करो और अधर्ममें कभी मन न लगाओ। देवताओं तथा ब्राह्मणोंकी सेवामें यथासमय तत्पर रहो ॥ ३९ ॥ शोकं त्यजत दैन्यं च सुतस्नेहान्निवर्तत । त्यज्यतामयमाकाशे ततः शीघ्रं निवर्तत ॥ ४० ॥ शोक और दीनताको छोड़ो तथा पुत्रस्नेहसे मनको हटा लो। इस बालकको इसी सूने स्थानमें छोड़ दो और शीघ्र लौट जाओ ॥ ४० ॥ यत् करोति शुभं कर्म तथा कर्म सुदारुणम् । तत् कर्तैव समश्नाति बान्धवानां किमत्र ह ॥ ४१ ॥ प्राणी जो शुभ या अशुभ कर्म करता है, उसका फल भी करनेवाला ही भोगता है। इसमें भाई-बन्धुओंका क्या है? ॥ ४१ ॥ इह त्यक्त्वा न तिष्ठन्ति बान्धवा बान्धवं प्रियम् । स्नेहमुत्सृज्य गच्छन्ति बाष्पपूर्णाविलेक्षणाः ॥ ४२ ॥ बन्धु-बान्धव लोग यहाँ अपने प्रिय बन्धुओंका परित्याग करके ठहरते नहीं हैं। सारा स्नेह छोड़कर आँखोंमें आँसू भरे यहाँसे चल देते हैं ॥ ४२ ॥ प्राज्ञो वा यदि वा मूर्खः सधनो निर्धनोऽपि वा । सर्वः कालवशं याति शुभाशुभसमन्वितः ॥ ४३ ॥ विद्वान् हो या मूर्ख, धनवान् हो या निर्धन, सभी अपने शुभ या अशुभ कर्मोंके साथ कालके अधीन हो जाते हैं ॥ ४३ ॥ किं करिष्यथ शोचित्वा मृतं किमनुशोचथ । सर्वस्य हि प्रभुः कालो धर्मतः समदर्शनः ॥ ४४ ॥