भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1012

प्रविष्ट हो गया है ।। ७१ ।।
तपसापि हि संयुक्ता धनवन्तो महाधियः ।
सर्वे मृत्युवशं यान्ति तदिदं प्रेतपत्तनम् ।। ७२ ।।
बड़े-बड़े तपस्वी, धनवान् और महा बुद्धिमान् सभी यहाँ मृत्युके अधीन हो जाते हैं। यह प्रेतोंका नगर है ।।
बालवृद्धसहस्राणि सदा संत्यज्य बान्धवाः ।
दिनानि चैव रात्रीश्च दुःखं तिष्ठन्ति भूतले ।। ७३ ।।
यहाँ लोगोंके भाई बन्धु सदा सहस्रों बालकों और वृद्धोंको त्यागकर दिन-रात दुखी रहते हैं ।। ७३ ।।
अलं निर्बन्धमागत्य शोकस्य परिधारणे ।
अप्रत्ययं कुतो ह्यस्य पुनरद्येह जीवितम् ।। ७४ ।।
दुराग्रहवश बारंबार लौटकर शोकका बोझ धारण करनेसे कोई लाभ नहीं है। अब इसके जीनेका कोई भरोसा नहीं है। भला, आज यहाँ इसका पुनर्जीवन कैसे हो सकता है? ।। ७४ ।।
मृतस्योत्सृष्टदेहस्य पुनर्देहो न विद्यते ।
नैव मूर्तिप्रदानेन जम्बुकस्य शतैरपि ।। ७५ ।।
शक्यं जीवयितुं ह्येष बालो वर्षशतैरपि ।
जो व्यक्ति एक बार इस देहसे नाता तोड़कर मर जाता है, उसके लिये फिर इस शरीरमें लौटना सम्भव नहीं है सैकड़ों सियार अपना शरीर बलिदान कर दें तो भी सैकड़ों वर्षोंमें इस बालकको जिलाया नहीं जा सकता ।। ७५ १/२ ।।
अथ रुद्रः कुमारो वा ब्रह्मा वा विष्णुरेव च ।। ७६ ।।
वरमस्मै प्रयच्छेयुस्ततो जीवेदयं शिशुः ।
यदि भगवान् शिव, कुमार कार्तिकेय, ब्रह्माजी और भगवान् विष्णु इसे वर दें तो यह बालक जी सकता है ।। ७६ १/२ ।।
नैव बाष्पविमोक्षेण न वा श्वासकृते न च ।। ७७ ।।
न दीर्घरुदितेनायं पुनर्जीवं गमिष्यति ।
न तो आँसू बहानेसे, न लंबी-लंबी सांस खींचनेसे और न दीर्घकालतक रोनेसे ही यह फिर जी सकेगा ।। ७७ १/२ ।।
अहं च क्रोष्टुकश्चैव यूयं ये चास्य बान्धवाः ।। ७८ ।।
धर्माधर्मौ गृहीत्वेह सर्वे वर्तामहेऽध्वनि ।
मैं, यह सियार और तुम सब लोग जो इसके भाई बन्धु हो—ये सभी धर्म और अधर्मको लेकर यहाँ अपनी-अपनी राहपर चल रहे हैं ।। ७८ १/२ ।।
अप्रियं परुषं चापि परद्रोहं परस्त्रियम् ।। ७९ ।।