महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1023, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंसदैव शकुनास्तात मृगाश्चाथ तथा गजाः । वसन्ति तव संहृष्टा मनोहर मनोहराः ॥ ११ ॥ ‘तात! मनोहर वृक्षराज! तुम्हारी शाखाओंपर सदा ही बहुत-से पक्षी तथा नीचे अनेकानेक मृग एवं हाथी प्रसन्नतापूर्वक निवास करते हैं ॥ ११ ॥
तव शाखा महाशाख स्कन्धांश्च विपुलांस्तथा । न वै प्रभग्नान् पश्यामि मारुतेन कथंचन ॥ १२ ॥ ‘महान् शाखाओंसे सुशोभित वनस्पते! मैं देखता हूँ कि तुम्हारी शाखाओं और मोटे तनोंको वायुदेव भी किसी तरह तोड़ नहीं सके हैं ॥ १२ ॥
किं नु ते पवनस्तात प्रीतिमानथवा सुहृत् । त्वां रक्षति सदा येन वनेऽत्र पवनो ध्रुवम् ॥ १३ ॥ ‘तात! क्या पवनदेव तुमसे किसी कारणवश विशेष प्रसन्न रहते हैं अथवा वे तुम्हारे सुहृद् हैं, जिससे इस वनमें सदा तुम्हारी निश्चितरूपसे रक्षा करते हैं ॥
भगवान् पवनः स्थानाद् वृक्षानुच्चावचानपि । पर्वतानां च शिखराण्याचालयति वेगवान् ॥ १४ ॥ ‘भगवान् वायु इतने वेगशाली हैं कि छोटे-बड़े वृक्षोंको कौन कहे, पर्वतोंके शिखरोंको भी अपने स्थानसे हिला देते हैं ॥ १४ ॥
शोषयत्येव पातालं बहन् गन्धवहः शुचिः । सरांसि सरितश्चैव सागरांश्च तथैव च ॥ १५ ॥ ‘गन्धवाही पवित्र पवन पाताल, सरोवर, सरिताओं और समुद्रोंको भी सुखा सकता है ॥ १५ ॥
संरक्षति त्वां पवनः सखित्वेन न संशयः । तस्मात् त्वं बहुशाखोऽपि पर्णवान् पुष्पवानपि ॥ १६ ॥ ‘इसमें संदेह नहीं कि वायुदेव तुम्हें अपना मित्र माननेके कारण ही तुम्हारी रक्षा करते हैं; इसीलिये तुम अनेक शाखाओंसे सम्पन्न तथा पत्ते और पुष्पोंसे हरे-भरे हो ॥ १६ ॥
इदं च रमणीयं ते प्रतिभाति वनस्पते । यदिमे विहगास्तात रमन्ते मुदितास्त्वयि ॥ १७ ॥ ‘तात वनस्पते! तुम्हारे पास यह बड़ा ही रमणीय दृश्य जान पड़ता है कि ये पक्षी तुम्हारी शाखाओंपर बड़े प्रसन्न रहकर रमण कर रहे हैं ॥ १७ ॥
एषां पृथक् समस्तानां श्रूयते मधुरस्वरः । पुष्पसम्मोदने काले वाशतां सुमनोहरम् ॥ १८ ॥ ‘वसन्त ऋतुमें अत्यन्त मनोरम बोली बोलनेवाले इन पक्षियोंका अलग-अलग तथा सबका एक साथ बड़ा मधुर स्वर सुनायी पड़ता है ॥ १८ ॥
तथेमे गर्जिता नागाः स्वयूथकुलशोभिताः ।