महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1026, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंभञ्जन् द्रुमान् पर्वतांश्च यच्चान्यदपि किंचन ॥ ७ ॥ जिस समय वायुदेवता वृक्ष, पर्वत तथा दूसरी वस्तुओंको तोड़ता-फोड़ता हुआ मेरे पास पहुँचता है, उस समय मैं बलसे उसकी गतिको रोक देता हूँ ॥ ७ ॥ स मया बहुशो भग्नः प्रभञ्जन् वै प्रभञ्जनः । तस्मान्न बिभ्ये देवर्षे क्रुद्धादपि समीरणात् ॥ ८ ॥ देवर्षे! इस प्रकार मैंने तोड़-फोड़ करनेवाले वायुकी गतिको अनेक बार रोक दिया है; अतः वह कुपित हो जाय तो भी मुझे उससे भय नहीं है ॥ ८ ॥
नारद उवाच
शाल्मले विपरीतं ते दर्शनं नात्र संशयः । न हि वायोर्बलेनास्ति भूतं तुल्यबलं क्वचित् ॥ ९ ॥ नारदजीने कहा— शाल्मले! इस विषयमें तुम्हारी दृष्टि विपरीत है—समझ उलटी हो गयी है, इसमें संशय नहीं है; क्योंकि वायुके बलके समान किसी भी प्राणीका बल नहीं है ॥ ९ ॥ इन्द्रो यमो वैश्रवणो वरुणश्च जलेश्वरः । नैतेऽपि तुल्या मरुतः किं पुनस्त्वं वनस्पते ॥ १० ॥ वनस्पते! इन्द्र, यम, कुबेर तथा जलके स्वामी वरुण—ये भी वायुके तुल्य बलशाली नहीं हैं; फिर तुम जैसे साधारण वृक्षकी तो बात ही क्या है? ॥ १० ॥ यच्च किंचिदिह प्राणी चेष्टते शाल्मले भुवि । सर्वत्र भगवान् वायुश्चेष्टाप्राणकरः प्रभुः ॥ ११ ॥ शाल्मले! प्राणी इस पृथ्वीपर जो कुछ भी चेष्टा करता है, उस चेष्टाकी शक्ति तथा जीवन देनेवाले सर्वत्र सामर्थ्यशाली भगवान् वायु ही हैं ॥ ११ ॥ एष चेष्टयते सम्यक् प्राणिनः सम्यगायातः । असम्यगायतो भूयश्चेष्टते विकृतं नृषु ॥ १२ ॥ ये जब शरीरमें ठीक ढंगसे प्राण आदिके रूपमें विस्तारको प्राप्त होते हैं, तब समस्त प्राणियोंको चेष्टाशील बनाते हैं और जब ये ठीक ढंगसे काम नहीं करते हैं, तब प्राणियोंके शरीरमें विकृति आने लगती है ॥ १२ ॥ स त्वमेवंविधं वायुं सर्वसत्त्वभृतां वरम् । न पूजयसि पूज्यं तं किमन्यद् बुद्धिलाघवात् ॥ १३ ॥ इस प्रकार समस्त बलवानोंमें श्रेष्ठ एवं पूजनीय वायुदेवकी जो तुम पूजा नहीं करते हो, यह तुम्हारी बुद्धिकी लघुताके सिवा और क्या है ॥ १३ ॥ असारश्चापि दुर्मेधाः केवलं बहु भाषसे । क्रोधादिभिरवच्छन्नो मिथ्या वदसि शाल्मले ॥ १४ ॥