महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 104, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंन प्रीयसे महाराज पूज्यमानो द्विजातिभिः ।। २६ ।।
भरतनन्दन! महाराज! आप ऐसे-ऐसे अनुपम पराक्रम करके द्विजातियोंद्वारा
सम्मानित होकर भी प्रसन्न नहीं हो रहे हैं? ।। २६ ।।
स त्वं भ्रातॄनिमान् दृष्ट्वा प्रतिनन्दस्व भारत ।
ऋषभानिव सम्मत्तान् गजेन्द्रानूर्जितानिव ।। २७ ।।
भारत! मतवाले साँडों और बलशाली गजराजोंके समान अपने इन भाइयोंको देखकर
आप इनका अभिनन्दन कीजिये ।। २७ ।।
अमरप्रतिमाः सर्वे शत्रुसाहाः परंतपाः ।
एकोऽपि हि सुखायैषां मम स्यादिति मे मतिः ।। २८ ।।
किं पुनः पुरुषव्याघ्र पतयो मे नरर्षभाः ।
समस्तानीन्द्रियाणीव शरीरस्य विचेष्टने ।। २९ ।।
पुरुषसिंह! शत्रुओंको संताप देनेवाले आपके ये सभी भाई शत्रु-सैनिकोंका वेग सहन
करनेमें समर्थ हैं, देवताओंके समान तेजस्वी हैं, मेरा विश्वास है कि इनमेंसे एक वीर भी मुझे
पूर्ण सुखी बना सकता है, फिर ये मेरे पाँचों नरश्रेष्ठ पति क्या नहीं कर सकते हैं? शरीरको
चेष्टाशील बनानेमें सम्पूर्ण इन्द्रियोंका जो स्थान है, वही मेरे जीवनको सुखी बनानेमें इन
सबका है ।। २८-२९ ।।
अनृतं नाब्रवीच्छ्वश्रूः सर्वज्ञा सर्वदर्शनी ।
युधिष्ठिरस्त्वां पाञ्चालि सुखे धास्यत्यनुत्तमे ।। ३० ।।
हत्वा राजसहस्राणि बहून्याशुपराक्रमः ।
तद् व्यर्थं सम्प्रपश्यामि मोहात् तव जनाधिप ।। ३१ ।।
महाराज! मेरी सास कभी झूठ नहीं बोलीं। वे सर्वज्ञ हैं और सब कुछ देखनेवाली हैं।
उन्होंने मुझसे कहा था—'पाञ्चालराजकुमारि! युधिष्ठिर शीघ्रतापूर्वक पराक्रम दिखानेवाले
हैं। ये कई सहस्र राजाओंका संहार करके तुम्हें सुखके सिंहासनपर प्रतिष्ठित करेंगे।' किंतु
जनेश्वर! आज आपका यह मोह देखकर मुझे अपनी सासकी कही हुई बात भी व्यर्थ होती
दिखायी देती है ।।
येषामुन्मत्तको ज्येष्ठः सर्वे तेऽप्यनुसारिणः ।
तवोन्मादान्महाराज सोन्मादाः सर्वपाण्डवाः ।। ३२ ।।
जिनका जेठा भाई उन्मत्त हो जाता है, वे सभी उसीका अनुकरण करने लगते हैं।
महाराज! आपके उन्मादसे सारे पाण्डव भी उन्मत्त हो गये हैं ।। ३२ ।।
यदि हि स्युरनुन्मत्ता भ्रातरस्ते नराधिप ।
बद्ध्वा त्वां नास्तिकैः सार्धं प्रशासैयुर्वसुन्धराम् ।। ३३ ।।
नरेश्वर! यदि ये आपके भाई उन्मत्त नहीं हुए होते तो नास्तिकोंके साथ आपको भी
बाँधकर स्वयं इस वसुधाका शासन करते ।। ३३ ।।