महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1041, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंभीष्म उवाच
रागो द्वेषस्तथा मोहो हर्षः शोकोऽभिमानिता । कामः क्रोधश्च दर्पश्च तन्द्री चालस्यमेव च ॥ ६ ॥ इच्छा द्वेषस्तथा तापः परवृद्ध्युपतापिता । अज्ञानमेतन्निर्दिष्टं पापानां चैव याः क्रियाः ॥ ७ ॥ भीष्मजीने कहा—राजन्! राग, द्वेष, मोह, हर्ष, शोक, अभिमान, काम, क्रोध, दर्प, तन्द्रा, आलस्य, इच्छा, वैर, ताप, दूसरोंकी उन्नति देखकर जलना और पापाचार करना— इन सबको (अज्ञानका कार्य होनेसे) अज्ञान बताया गया है ॥ ६-७ ॥
एतस्य वा प्रवृत्तेश्च वृद्ध्यादीन्यांश्च पृच्छसि । विस्तरेण महाराज शृणु तच्च विशेषतः ॥ ८ ॥ महाराज! इस अज्ञानकी उत्पत्ति और वृद्धि आदिके विषयमें जो प्रश्न कर रहे हो, उसके विषयमें विशेष विस्तारके साथ किया हुआ मेरा वर्णन सुनो ॥ ८ ॥
उभावेतौ समफलौ समदोषौ च भारत । अज्ञानं चातिलोभश्चाप्येकं जानीहि पार्थिव ॥ ९ ॥ भारत! पृथ्वीनाथ! अज्ञान और अत्यन्त लोभ—इन दोनोंको एक समझो, क्योंकि इनके परिणाम और दोष समान ही हैं ॥ ९ ॥
लोभप्रभवमज्ञानं वृद्धं भूयः प्रवर्धते । स्थाने स्थानं क्षये क्षैण्यमुपैति विविधां गतिम् ॥ १० ॥ लोभसे ही अज्ञान प्रकट होता है और लोभके बढ़नेपर वह अज्ञान और भी बढ़ता है। जबतक लोभ रहता है, तबतक अज्ञान भी बना रहता है और जब लोभका क्षय होता है, तब अज्ञान भी क्षीण हो जाता है। अज्ञान और लोभके कारण ही जीव नाना प्रकारकी योनियोंमें जन्म लेता है ॥ १० ॥
मूलं लोभस्य मोहो वै कालात्मगतिरेव च । छिन्ने भिन्ने तथा लोभे कारणं काल एव च ॥ ११ ॥ मोह ही निःसंदेह लोभका मूलकारण है। यह कालस्वरूप मोहात्मक अज्ञान ही मनुष्यकी बुरी गतिका कारण है। लोभके छिन्न-भिन्न होनेमें भी काल ही कारण है ॥ ११ ॥
तस्याज्ञानाद्धि लोभो हि लोभादज्ञानमेव च । सर्वदोषास्तथा लोभात् तस्माल्लोभं विवर्जयेत् ॥ १२ ॥ मूढ़ मनुष्यको अज्ञानसे लोभ और लोभसे अज्ञान होता है। लोभसे ही सारे दोष पैदा होते हैं; इसलिये लोभको त्याग देना चाहिये ॥ १२ ॥
जनको युवनाश्वश्च वृषादर्भिः प्रसेनजित् । लोभक्षयाद् दिवं प्राप्तास्तथैवान्ये नराधिपाः ॥ १३ ॥