महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1047, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंजैसे आकाशमें पक्षियोंका और जलमें जलचर जन्तुओंका पदचिह्न नहीं दिखायी देता, उसी प्रकार ज्ञानीकी गति भी जाननेमें नहीं आती है। इसमें तनिक भी संशय नहीं है॥ २८॥ गृहानुत्सृज्य यो राजन् मोक्षमेवाभिपद्यते । लोकास्तेजोमयास्तस्य कल्पन्ते शाश्वतीः समाः ॥ २९ ॥ राजन्! जो घर-बार को छोड़कर मोक्षमार्गका ही आश्रय लेता है, उसे अनन्त वर्षोंके लिये दिव्य तेजोमय लोक प्राप्त होते हैं ॥ २९ ॥ संन्यस्य सर्वकर्माणि संन्यस्य विधिवत् तपः । संन्यस्य विविधा विद्याः सर्वं संन्यस्य चैव ह ॥ ३० ॥ कामे शुचिरनावृत्तः प्रसन्नात्माऽऽत्मविच्छुचिः । प्राप्येह लोके सत्कारं स्वर्गं समभिपद्यते ॥ ३१ ॥ जिसका आचार-विचार शुद्ध और अन्तःकरण निर्मल है, जिसकी कामनाएँ शुद्ध हैं तथा जो भोगोंसे पराङ्मुख हो चुका है, वह आत्मज्ञानी पुरुष सम्पूर्ण कर्मोंका, तपस्याका तथा नाना प्रकारकी विद्याओंका विधिवत् संन्यास (त्याग) करके सर्वत्यागी संन्यासी होकर इहलोकमें सम्मानित हो परलोकमें अक्षय स्वर्ग (ब्रह्मधाम) को प्राप्त होता है ॥ ३०-३१ ॥ यच्च पैतामहं स्थानं ब्रह्मराशिसमुद्भवम् । गुहायां निहितं नित्यं तद् दमेनाभिगम्यते ॥ ३२ ॥ ब्रह्मराशिसे उत्पन्न हुआ जो पितामह ब्रह्माजीका उत्तम धाम है, वह हृदयगुहामें छिपा हुआ है। उसकी प्राप्ति सदा दम (इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रह) से ही होती है ॥ ३२ ॥ ज्ञानारामस्य बुद्धस्य सर्वभूताविरोधिनः । नावृत्तिभयमस्तीह परलोकभयं कुतः ॥ ३३ ॥ जिसका किसी भी प्राणीके साथ विरोध नहीं है, जो ज्ञानस्वरूप आत्मामें रमता रहता है, ऐसे ज्ञानीको इस लोकमें पुनः जन्म लेनेका भय ही नहीं रहता, फिर उसे परलोकका भय कैसे हो सकता है? ॥ ३३ ॥ एक एव दमे दोषो द्वितीयो नोपपद्यते । यदेनं क्षमया युक्तमशक्तं मन्यते जनः ॥ ३४ ॥ दम अर्थात् संयममें एक ही दोष है, दूसरा नहीं। वह यह कि क्षमाशील होनेके कारण उसे लोग असमर्थ समझने लगते हैं ॥ ३४ ॥ एकोऽस्य सुमहाप्राज्ञ दोषः स्यात् सुमहान् गुणः । क्षमया विपुला लोकाः सुलभा हि सहिष्णुता ॥ ३५ ॥ महाप्राज्ञ युधिष्ठिर! उसका यह एक दोष ही महान् गुण हो सकता है। क्षमा धारण करनेसे उसको बहुत से पुण्यलोक सुलभ होते हैं। साथ ही क्षमासे सहिष्णुता भी आ जाती है ॥ ३५ ॥