महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1053, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंकल्याणं कुरुते बाढं धीमान् न ग्लायते क्वचित् । प्रशान्तवाङ्मना नित्यं ह्रीस्तु धर्मादवाप्यते ॥ १५ ॥ जो बुद्धिमान् पुरुष भलीभाँति दूसरोंका कल्याण करता है और मनमें कभी खेद नहीं मानता, जिसकी मन-वाणी सदा शान्त रहती है, वह लज्जाशील माना जाता है। यह लज्जा नामक गुण धर्मके आचरणसे प्राप्त होता है॥ १५॥
धर्मार्थहेतोः क्षमते तितिक्षा क्षान्तिरुच्यते । लोकसंग्रहणार्थं वै सा तु धैर्येण लभ्यते ॥ १६ ॥ धर्म और अर्थके लिये मनुष्य जो कष्ट सहन करता है, उसकी वह सहनशीलता 'तितिक्षा' कहलाती है। लोगोंके सामने आदर्श उपस्थित करनेके लिये उसका अवश्य पालन करना चाहिये। तितिक्षाकी प्राप्ति धैर्यसे होती है। (दूसरोंके दोष न देखना 'अनसूया' है)॥ १६॥
त्यागः स्नेहस्य यत् त्यागो विषयाणां तथैव च । रागद्वेषप्रहीणस्य त्यागो भवति नान्यथा ॥ १७ ॥ विषयोंकी आसक्तिका जो त्याग है, वही वास्तविक त्याग है। राग-द्वेषसे रहित होनेपर ही त्यागकी सिद्धि होती है, अन्यथा नहीं (परमात्मचिन्तनका नाम ही 'ध्यान' है)॥ १७॥
आर्यता नाम भूतानां यः करोति प्रयत्नतः । शुभं कर्म निराकारो वीतरागस्तथैव च ॥ १८ ॥ जो मनुष्य अपनेको प्रकट न करके प्रयत्नपूर्वक प्राणियोंकी भलाईका काम करता रहता है, उसके उस श्रेष्ठ भाव और आचरणका नाम ही 'आर्यता' है। यह आसक्तिके त्यागसे प्राप्त होता है॥ १८॥
धृतिर्नाम सुखे दुःखे यथा नाप्नोति विक्रियाम् । ता भजेत सदा प्राज्ञो य इच्छेद् भूतिमात्मनः ॥ १९ ॥ सुख या दुःख प्राप्त होनेपर मनमें विकार न होना 'धृति' है। जो अपनी उन्नति चाहता हो, उस बुद्धिमान् पुरुषको सदा ही 'धृति' का सेवन करना चाहिये॥ १९॥
सर्वथा क्षमिणा भाव्यं तथा सत्यपरेण च । वीतहर्षभयक्रोधो धृतिमाप्नोति पण्डितः ॥ २० ॥ मनुष्यको सदा क्षमाशील होना तथा सत्यमें तत्पर रहना चाहिये। जिसने हर्ष, भय और क्रोध तीनोंको त्याग दिया है, उस विद्वान् पुरुषको ही 'धैर्य' की प्राप्ति होती है॥ २०॥
अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा । अनुग्रहश्च दानं च सतां धर्मः सनातनः ॥ २१ ॥ मन, वाणी और क्रियाद्वारा सभी प्राणियोंके साथ कभी द्रोह न करना तथा दया और दान—यह श्रेष्ठ पुरुषोंका सनातन धर्म है॥ २१॥
एते त्रयोदशाकाराः पृथक् सत्यैकलक्षणाः ।