भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1060, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1060

करनेवाला, दूसरोंकी जीविकाका नाश करनेवाला और शठ है, भोग्य वस्तुओंको दूसरोंको दिये बिना ही अकेले भोगता है, जिसके भीतर अभिमान भरा हुआ है, जो विषयोंमें आसक्त और अपनी प्रशंसाके लिये व्यर्थ ही बढ़-बढ़कर बातें बनानेवाला है, जिसके मनमें सबके प्रति संदेह बना रहता है, जो कौएकी तरह वंचक दृष्टि रखनेवाला है, जिसमें कृपणता कूट- कूटकर भरी है, जो अपने ही वर्गके लोगोंकी प्रशंसा करता, सदा आश्रमोंसे द्वेष रखता और वर्णसंकरता फैलाता है, सदा हिंसाके लिये ही जिसका घूमना-फिरना होता है, जो गुणको भी अवगुणके समान समझता और बहुत झूठ बोलता है, जिसके मनमें उदारता नहीं है और जो अत्यन्त लोभी है, ऐसा मनुष्य ही नृशंस कर्म करनेवाला कहा गया है ।। ४—७ ।।

धर्मशीलं गुणोपेतं पापमित्यवगच्छति । आत्मशीलप्रमाणे न विश्वसिति कस्यचित् ।। ८ ।। वह धर्मात्मा और गुणवान् पुरुषको ही पापी मानता है और अपने स्वभावको आदर्श मानकर किसीपर विश्वास नहीं करता है ।। ८ ।।

परेषां यत्र दोषः स्यात् तद् गुह्यं सम्प्रकाशयेत् । समानेष्वेव दोषेषु वृत्त्यर्थमुपघातयेत् ।। ९ ।। जहाँ दूसरोंकी बदनामी होती हो, वहाँ उनके गुप्त दोषोंको भी प्रकट कर देता है और अपने तथा दूसरेके अपराध बारबर होनेपर भी वह आजीविकाके लिये दूसरेका ही सर्वनाश करता है ।। ९ ।।

तथोपकारिणं चैव मन्यते वञ्चितं परम् । दत्त्वापि च धनं काले संतपत्युपकारिणे ।। १० ।। जो उसका उपकार करता है, उसको वह अपने जालमें फँसा हुआ समझता है और उपकारीको भी यदि कभी धन देता है तो उसके लिये बहुत समयतक पश्चात्ताप करता रहता है ।। १० ।।

भक्ष्यं पेयमथालेह्यं यच्चान्यत् साधु भोजनम् । प्रेक्षमाणेषु योऽश्रीयान्नृशंसमिति तं वदेत् ।। ११ ।। जो मनुष्य दूसरोंके देखते रहनेपर भी उत्तम भक्ष्य, पेय, लेह्य तथा दूसरे-दूसरे भोज्य पदार्थोंको अकेला ही खा जाता है, उसको भी नृशंस ही कहना चाहिये ।। ११ ।।

ब्राह्मणेभ्यः प्रदायाग्रं यः सुहृद्भिः सहाश्नुते । स प्रेत्य लभते स्वर्गमिह चानन्त्यमश्नुते ।। १२ ।। जो पहले ब्राह्मणको देकर पीछे अपने सुहृदोंके साथ स्वयं भोजन करता है, वह इस लोकमें अनन्त सुख भोगता है और मृत्युके पश्चात् स्वर्गलोकमें जाता है ।। १२ ।।

एष ते भरतश्रेष्ठ नृशंसः परिकीर्तितः । सदा विवर्जनीयो हि पुरुषेण विजानता ।। १३ ।।

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