महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1062, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
नाना प्रकारके पापों और उनके प्रायश्चित्तोंका वर्णन
भीष्म उवाच
हृतार्थो यक्ष्यमाणश्च सर्ववेदान्तगश्च यः।
आचार्यपितृकार्यार्थं स्वाध्यायार्थमथापि च ॥ १ ॥
एते वै साधवो दृष्टा ब्राह्मणा धर्मभिक्षवः।
निःस्वेभ्यो देयमेतेभ्यो दानं विद्या च भारत ॥ २ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! सम्पूर्ण वेदों और उपनिषदोंका पारंगत विद्वान् ब्राह्मण यदि यज्ञ करनेवाला हो तथा उसका धन चोर चुरा ले गये हों तो राजाका कर्तव्य है कि वह उसे आचार्यकी दक्षिणा देने, पितरोंका श्राद्ध करने तथा वेद-शास्त्रोंका स्वाध्याय करनेके लिये धन दे। भरतनन्दन! ये श्रेष्ठ ब्राह्मण प्रायः धर्मके लिये धनकी भिक्षा माँगते देखे गये हैं। इन्हें दान और विद्याध्ययनके लिये धन देना चाहिये ॥ १-२ ॥
अन्यत्र दक्षिणादानं देयं भरतसत्तम।
अन्येभ्योऽपि बहिर्वेदि चाकृतान्नं विधीयते ॥ ३ ॥
भरतश्रेष्ठ! इससे भिन्न परिस्थितिमें ब्राह्मणको केवल दक्षिणा देनी चाहिये और ब्राह्मणेतर मनुष्योंको भी यज्ञवेदीसे बाहर कच्चा अन्न देनेका विधान है ॥ ३ ॥
सर्वरत्नानि राजा हि यथार्हं प्रतिपादयेत्।
ब्राह्मणा एव वेदाश्च यज्ञाश्च बहुदक्षिणाः।
अन्योन्यं विभवाचारा यजन्ते गुणतः सदा ॥ ४ ॥
राजाको चाहिये कि वह ब्राह्मणोंको उनकी योग्यताके अनुसार सब प्रकारके रत्नोंका दान करे; क्योंकि ब्राह्मण ही वेद एवं बहुसंख्यक दक्षिणावाले यज्ञरूप हैं। अपनी सम्पत्तिके अनुसार समस्त कार्योंका आयोजन करनेवाले वे ब्राह्मण सदा आपसमें मिलकर गुणयुक्त यज्ञका अनुष्ठान करते हैं ॥ ४ ॥
यस्य त्रैवार्षिकं भक्तं पर्याप्तं भृत्यवृत्तये।
अधिकं चापि विद्येत स सोमं पातुमर्हति ॥ ५ ॥
जिस ब्राह्मणके पास अपने पालनीय कुटुम्बी-जनोंके भरण-पोषणके लिये तीन वर्षतक उपभोगमें आने लायक पर्याप्त धन हो अथवा उससे भी अधिक वैभव विद्यमान हो, वही सोमपानका अधिकारी है—उसे ही सोमयागका अनुष्ठान करना चाहिये ॥ ५ ॥
यज्ञश्चेत् प्रतिरुद्धः स्यादंशेनैकेन यज्वनः।