भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1065

धनैर्वैश्यश्च शूद्रश्च मन्त्रैर्होमैश्च वै द्विजः । अतः उसके प्रति अमङ्गलसूचक बात न कहे। रूखे वचन न बोले। क्षत्रिय अपने बाहुबलसे, वैश्य और शूद्र धनके बलसे तथा ब्राह्मण मन्त्र एवं हवनकी शक्तिसे अपनी विपत्तिसे पार हो सकता है ॥ २० १/२ ॥ नैव कन्या न युवतिर्नामन्त्रज्ञो न बालिशः ॥ २१ ॥ परिवेष्टाग्निहोत्रस्य भवेन्नासंस्कृतस्तथा । न कन्या, न युवती, न मन्त्र न जाननेवाला, न मूर्ख और न संस्कारहीन पुरुष ही अग्निमें हवन करनेका अधिकारी है ॥ २१ १/२ ॥ नरकं निपतन्त्येते जुह्वानाः स च यस्य तत् । तस्माद् वैतानकुशलो होता स्याद् वेदपारगः ॥ २२ ॥ यदि ये हवन करते हैं तो स्वयं तो नरकमें पड़ते ही हैं, जिसका वह यज्ञ है, वह भी नरकमें गिरता है। अतः जो यज्ञकर्ममें कुशल और वेदोंका पारङ्गत विद्वान् हो, वही होता हो सकता है ॥ २२ ॥ प्राजापत्यमदत्त्वाश्वमग्न्याधेयस्य दक्षिणाम् । अनाहिताग्निरिति स प्रोच्यते धर्मदर्शिभिः ॥ २३ ॥ जो अग्निहोत्र आरम्भ करके प्रजापति देवताके लिये अश्वरूप दक्षिणाका दान नहीं करता, धर्मदर्शी पुरुष उसे अनाहिताग्नि कहते* हैं ॥ २३ ॥ पुण्यानि यानि कुर्वीत श्रद्दधानो जितेन्द्रियः । अनाप्तदक्षिणैर्यज्ञैर्न यजेत कथञ्चन ॥ २४ ॥ मनुष्य जो भी पुण्यकर्म करे उसे श्रद्धापूर्वक और जितेन्द्रिय भावसे करे। पर्याप्त दक्षिणा दिये बिना किसी तरह यज्ञ न करे ॥ २४ ॥ प्रजाः पशूंश्च स्वर्गं च हन्ति यज्ञो ह्यदक्षिणः । इन्द्रियाणि यशः कीर्तिमायुश्चाप्यवकृन्तति ॥ २५ ॥ बिना दक्षिणाका यज्ञ प्रजा और पशुका नाश करता है; और स्वर्गकी प्राप्तिमें भी विघ्न डाल देता है। इतना ही नहीं वह इन्द्रिय, यश, कीर्ति तथा आयुको भी क्षीण करता है ॥ २५ ॥ उदक्यामासते ये च द्विजाः केचिदनग्नयः । होमं चाश्रोत्रियं येषां ते सर्वे पापकर्मिणः ॥ २६ ॥ जो ब्राह्मण रजस्वला स्त्रीके साथ समागम करते हैं, जिन्होंने घरमें अग्निकी स्थापना नहीं की है; तथा जो अवैदिक रीतिसे हवन करते हैं, वे सभी पापाचारी हैं ॥ २६ ॥ उदपानोदके ग्रामे ब्राह्मणो वृषलीपतिः । उषित्वा द्वादश समाः शूद्रकर्मैव गच्छति ॥ २७ ॥