महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1070, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्विगुणा ब्रह्महत्या वै आत्रेयीनिधने भवेत् ।
इसी तरह जो जान-बूझकर गर्भिणी स्त्रीकी हत्या करता है; उसे उस गर्भिणी-वधके
कारण दो ब्रह्महत्याओंका पाप लगता है ।। ५४ १/२ ।।
सुरापो नियताहारो ब्रह्मचारी क्षितीशयः ।। ५५ ।।
ऊर्ध्वं त्रिभ्योऽपि वर्षेभ्यो यजेताग्निष्टुता परम् ।
ऋषभैकसहस्रं वा गा दत्त्वा शौचमाप्नुयात् ।। ५६ ।।
मदिरा पीनेवाला मनुष्य मिताहारी और ब्रह्मचारी होकर पृथ्वीपर शयन करे। इस तरह
तीन वर्षोंतक रहनेके बाद 'अग्निष्टोम' यज्ञ करे। तत्पश्चात् एक हजार बैल या इतनी ही गौएँ
ब्राह्मणोंको दान दे तो वह शुद्ध हो जाता है ।। ५५-५६ ।।
वैश्यं हत्वा तु वर्षे द्वे ऋषभैकशतं च गाः ।
शूद्रं हत्वाब्दमेवैकमृषभं च शतं च गाः ।। ५७ ।।
यदि वैश्यकी हत्या कर दे तो दो वर्षोंतक पूर्वोक्त नियमसे रहनेके बाद एक सौ बैल
और एक सौ गौओंका दान करे, तथा शूद्रकी हत्या कर देनेपर हत्यारेको एक वर्षतक
पूर्वोक्त नियमसे रहकर एक बैल और सौ गौओंका दान करना चाहिये ।। ५७ ।।
श्ववराहखरान् हत्वा शौद्रमेव व्रतं चरेत् ।
मार्जारचाषमण्डूकान् काकं व्यालं च मूषिकम् ।। ५८ ।।
उक्तः पशुसमो दोषो राजन् प्राणिनिपातनात् ।
कुत्ते, सूअर और गदहोंकी हत्या करके मनुष्य शूद्रवध-सम्बन्धी व्रतका ही आचरण करे।
राजन्! बिल्ली, नीलकण्ठ, मेढक, कौआ, साँप और चूहा आदि प्राणियोंको मारनेसे भी
उक्त पशुवधके ही समान पाप बताया गया है ।। ५८ १/२ ।।
प्रायश्चित्तान्यथान्यानि प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः ।। ५९ ।।
अल्पे वाप्यथ शोचेत पृथक् संवत्सरं चरेत् ।
त्रीणि श्रोत्रियभार्यायां परदारे च द्वे स्मृते ।। ६० ।।
काले चतुर्थे भुञ्जानो ब्रह्मचारी व्रती भवेत् ।
स्थानासनाभ्यां विहरेत् त्रिरह्नाभ्युपयन्नपः ।
एवमेव निराकर्ता यश्चाग्नीनपविध्यति ।। ६१ ।।
अब दूसरे प्रायश्चित्तोंका भी क्रमशः वर्णन करता हूँ। अनजानमें कीड़ों-मकोड़ोंका वध
आदि छोटा पाप हो जाय तो उसके लिये पश्चात्ताप करे। इतनेहीसे उसकी शुद्धि हो जाती
है। गोवधके सिवा अन्य जितने उपपातक हैं उनमेंसे प्रत्येकके लिये एक-एक वर्षतक
व्रतका आचरण करे। श्रोत्रियकी पत्नीसे व्यभिचार करनेपर तीन वर्षतक और अन्य
परस्त्रियोंसे समागम करनेपर दो वर्षोंतक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए दिनके चौथे
पहरमें एक बार भोजन करे। अपने लिये पृथक् स्थान और आसनकी व्यवस्था रखते हुए
घूमता रहे। दिनमें तीन बार जलसे स्नान करे। ऐसा करनेसे ही वह अपने उपर्युक्त पापोंका