भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1072

परिवित्तिः परिवेत्ता या चैव परिविद्यते ।

पाणिग्राहास्त्वधर्मेण सर्वे ते पतिताः स्मृताः ।। ६८ ।।

ज्येष्ठ भाईका विवाह होनेसे पहले ही यदि छोटा भाई अधर्मपूर्वक विवाह कर ले तो

ज्येष्ठको 'परिवित्ति' कहते हैं; छोटे भाईको 'परिवेत्ता' हैं और उसकी पत्नीको जिसका

परिवेदन (ग्रहण) किया जाता है, परिवेदनीया कहते हैं-ये सब-के-सब पतित माने गये

हैं ।। ६८ ।।

चरेयुः सर्व एवैते वीरहा यद् व्रतं चरेत् ।

चान्द्रायणं चरेन्मासं कृच्छ्रं वा पापशुद्धये ।। ६९ ।।

इन तीनोंको पृथक्-पृथक् अपनी शुद्धिके लिये उसी व्रतका आचरण करना चाहिये जो

यज्ञहीन ब्राह्मणके लिये बताया गया है। अथवा एक मासतक चान्द्रायण या कृच्छ्रचान्द्रायण

व्रत करे ।। ६९ ।।

परिवेत्ता प्रयच्छेत तां स्नुषां परिवित्तये ।

ज्येष्ठेन त्वभ्यनुज्ञातो यवीयानप्यनन्तरम् ।

एवं च मोक्षमाप्नोति तौ च सा चैव धर्मतः ।। ७० ।।

परिवेत्ता पुरुष उस नववधूको पतोहूके रूपमें ज्येष्ठ भाईको सौंप दे और ज्येष्ठ भाईकी

आज्ञा मिलनेपर छोटा भाई उसे पत्नीरूपमें ग्रहण करे। ऐसा करनेपर वे तीनों धर्मके

अनुसार पापसे छुटकारा पाते हैं ।। ७० ।।

अमानुषीषु गोवर्ज्यमनावृष्टिर्न दुष्यति ।

अधिष्ठात्रवमन्तारं पशूनां पुरुषं विदुः ।। ७१ ।।

पशु जातियोंमें गौओंको छोड़कर अन्य किसीकी अनजानमें हिंसा हो जाय तो वह

दोषावह नहीं मानी जाती; क्योंकि मनुष्यको पशुओंका अधिष्ठाता एवं पालक माना गया

है ।। ७१ ।।

परिधायोर्ध्ववालं तु पात्रमादाय मृन्मयम् ।

चरेत् सप्तगृहान्नित्यं स्वकर्म परिकीर्तयन् ।। ७२ ।।

तत्रैव लब्धभोजी स्याद् द्वादशाहात्स शुद्धयति ।

चरेत् संवत्सरं चापि तद् व्रतं येन कृन्तति ।। ७३ ।।

गोवध करनेवाला पापी उस गायकी पूँछको इस प्रकार धारण करे कि उसका बाल

ऊपरकी ओर रहे। फिर मिट्टीका पात्र हाथमें लेकर प्रतिदिन सात घरोंमें भिक्षा माँगे और

अपने पापकर्मकी बात कहकर लोगोंको सुनाता रहे। उन्हीं सात घरोंकी भिक्षामें जो अन्न

मिल जाय, वही खाकर रहे। ऐसा करनेसे वह बारह दिनोंमें शुद्ध हो जाता है। यदि पाप

अधिक हो तो एक वर्षतक उस व्रतका अनुष्ठान करे, जिससे वह अपने पापको नष्ट कर

देता है ।। ७२-७३ ।।

भवेत्तु मानुषेष्वेवं प्रायश्चित्तमनुत्तमम् ।