भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1102

देख ब्राह्मणने पहचान लिया। पहचानकर वे बड़े लज्जित हुए और उससे इस प्रकार बोले — ॥ ४४-४५ ॥

किमिदं कुरुषे मोहाद् विप्रस्त्वं हि कुलोद्वहः ।
मध्यदेशपरिज्ञातो दस्युभावं गतः कथम् ॥ ४६ ॥
‘अरे! तू मोहवश यह क्या कर रहा है? तू तो मध्यदेशका विख्यात एवं कुलीन ब्राह्मण था। यहाँ डाकू कैसे बन गया? ॥ ४६ ॥

पूर्वान् स्मर द्विज ज्ञातीन् प्रख्यातान् वेदपारगान् ।
तेषां वंशेऽभिजातस्त्वमीदृशः कुलपांसनः ॥ ४७ ॥
‘ब्रह्मन्! अपने पूर्वजोंको तो याद कर। उनकी कितनी ख्याति थी। वे कैसे वेदोंके पारङ्गत विद्वान् थे और तू उन्हींके वंशमें पैदा होकर ऐसा कुलकलङ्क निकला ॥ ४७ ॥

अवबुध्यात्मनाऽऽत्मानं सत्त्वं शीलं श्रुतं दमम् ।
अनुक्रोशं च संस्मृत्य त्यज वासमिमं द्विज ॥ ४८ ॥
‘अब भी तो अपने-आपको पहचान! तू द्विज है; अतः द्विजोचित सत्त्व, शील, शास्त्रज्ञान, संयम और दयाभावको याद करके अपने इस निवासस्थानको त्याग दे’ ॥ ४८ ॥

स एवमुक्तः सुहृदा तेन तत्र हितैषिणा ।
प्रत्युवाच ततो राजन् विनिश्चित्य तदार्तवत् ॥ ४९ ॥
राजन्! अपने उस हितैषी सुहृद्के इस प्रकार कहनेपर गौतम मन-ही-मन कुछ निश्चय करके आर्त-सा होकर बोला— ॥ ४९ ॥

निर्धनोऽस्मि द्विजश्रेष्ठ नापि वेदविदप्यहम् ।
वित्तार्थमिह सम्प्राप्तं विद्धि मां द्विजसत्तम ॥ ५० ॥
‘द्विजश्रेष्ठ! मैं निर्धन हूँ और वेदको भी नहीं जानता; अतः द्विजप्रवर! मुझे धन कमानेके लिये इधर आया हुआ समझें ॥ ५० ॥

त्वद्दर्शनात् तु विप्रेन्द्र कृतार्थोऽस्म्यद्य वै द्विज ।
आवां हि सह यास्यावः श्वो वसस्वाद्य शर्वरीम् ॥ ५१ ॥
‘विप्रेन्द्र! आज आपके दर्शनसे मैं कृतार्थ हो गया। ब्रह्मन्! अब रातभर यहीं रहिये, कल सबेरे हम दोनों साथ ही चलेंगे’ ॥ ५१ ॥

स तत्र न्यवसद् विप्रो घृणी किञ्चिदसंस्पृशन् ।
क्षुधितश्छन्द्यमानोऽपि भोजनं नाभ्यनन्दत ॥ ५२ ॥
वह ब्राह्मण दयालु था। गौतमके अनुरोधसे उसके यहाँ ठहर गया, किंतु वहाँकी किसी भी वस्तुको हाथसे छूआ भी नहीं। यद्यपि वह भूखा था और भोजन करनेके लिये गौतमद्वारा उससे बड़ी अनुनय-विनय की गई तो भी किसी तरह वहाँका अन्न ग्रहण करना उसने स्वीकार नहीं किया ॥ ५२ ॥