भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1105

थे ॥ ६ ॥ सर्वर्तुकैराम्रवणैः पुष्पितैरुपशोभितम् । नन्दनोद्देशसदृशं यक्षकिन्नरसेवितम् ॥ ७ ॥ सभी ऋतुओंमें फूलने-फलनेवाली आम्रवृक्षोंकी पंक्तियाँ उस वनकी शोभा बढ़ा रही थीं। यक्षों और किन्नरोंसे सेवित वह प्रदेश नन्दनवनके समान मनोरम जान पड़ता था ॥ ७ ॥ शालैस्तालैस्तमालैश्च कालागुरुवनैस्तथा । चन्दनस्य च मुख्यस्य पादपैरुपशोभितम् । गिरिप्रस्थेषु रम्येषु तेषु तेषु सुगन्धिषु ॥ ८ ॥ समन्ततो द्विजश्रेष्ठास्तत्राकूजन्त वै तदा । शाल, ताल, तमाल, काले अगुरुके वन तथा श्रेष्ठ चन्दनके वृक्ष उस वनको सुशोभित करते थे। वहाँके रमणीय और सुगन्धित पर्वतीय समतल प्रदेशोंमें चारों ओर उत्तमोत्तम पक्षी कलरव कर रहे थे ॥ ८ १/२ ॥ मनुष्यवदनाश्चान्ये भारुण्डा इति विश्रुताः ॥ ९ ॥ भूलिङ्गशकुनाश्चान्ये सामुद्राः पर्वतोद्भवाः । कहीं मनुष्योंके समान मुखवाले 'भारुण्ड' नामक पक्षी बोलते थे। कहीं समुद्रतट और पर्वतोंपर रहनेवाले भूलिङ्ग पक्षी तथा अन्य विहंगम चहचहा रहे थे ॥ ९ १/२ ॥ स तान्यतिमनोज्ञानि विहगानां रुतानि वै ॥ १० ॥ शृण्वन् सुरमणीयानि विप्रोऽगच्छत गौतमः । पक्षियोंके उन मधुर मनोहर एवं रमणीय कलरवोंको सुनता हुआ गौतम ब्राह्मण आगे बढ़ता चला गया ॥ १० १/२ ॥ ततोऽपश्यत् सुरम्येषु सुवर्णसिकताचिते ॥ ११ ॥ देशे समे सुखे चित्रे स्वर्गोद्देशसमे नृप । श्रिया जुष्टं महावृक्षं न्यग्रोधं च सुमण्डलम् ॥ १२ ॥ शाखाभिरनुरूपाभिर्भूयिष्ठं छत्रसंनिभम् । तस्य मूलं च संसिक्तं वरचन्दनवारिणा ॥ १३ ॥ नरेश्वर! तदनन्तर उन रमणीय प्रदेशोंमेंसे एक ऐसे स्थानपर जो सुवर्णमयी बालुकाराशिसे व्याप्त, समतल, सुखद, विचित्र तथा स्वर्गीय भूमिके समान मनोहर था, गौतमने एक अत्यन्त शोभायमान बरगदका विशाल वृक्ष देखा, जो चारों ओर मण्डलाकार फैला हुआ था। अपनी बहुत-सी सुन्दर शाखाओंके कारण वह वृक्ष एक महान् छत्रके समान जान पड़ता था। उसकी जड़ चन्दनमिश्रित जलसे सींची गयी थी ॥ ११-१३ ॥ दिव्यपुष्पान्वितं श्रीमत् पितामहसभोपमम् । तं दृष्ट्वा गौतमः प्रीतो मनःकान्तमनुत्तमम् ॥ १४ ॥