महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 112, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंविधाताने दण्डका विधान इस उद्देश्यसे किया है कि चारों वर्णोंके लोग आनन्दसे रहें, सबमें अच्छी नीतिका बर्ताव हो तथा पृथ्वीपर धर्म और अर्थकी रक्षा रहे ।। यदि दण्डान्न बिभीयुर्वयांसि श्वापदानि च । अद्युः पशून् मनुष्यांश्च यज्ञार्थानि हवींषि च ।। ३६ ।। यदि पक्षी और हिंसक जीव दण्डके भयसे डरते न होते तो वे पशुओं, मनुष्यों और यज्ञके लिये रखे हुए हविष्योंको खा जाते ।। ३६ ।। न ब्रह्मचार्यधीयीत कल्याणी गौर्न दुह्यते । न कन्योद्वहनं गच्छेद यदि दण्डो न पालयेत् ।। ३७ ।। यदि दण्ड मर्यादाकी रक्षा न करे तो ब्रह्मचारी वेदोंके अध्ययनमें न लगे, सीधी गौ भी दूध न दुहावे और कन्या ब्याह न करे ।। ३७ ।। विष्वग्लोपः प्रवर्तेत भिद्येरन् सर्वसेतवः । ममत्वं न प्रजानीयुर्यदि दण्डो न पालयेत् ।। ३८ ।। यदि दण्ड मर्यादाका पालन न करावे तो चारों ओरसे धर्म-कर्मका लोप हो जाय, सारी मर्यादाएँ टूट जायँ और लोग यह भी न जानें कि कौन वस्तु मेरी है और कौन नहीं? ।। ३८ ।। न संवत्सरसत्राणि तिष्ठेयुरकुतोभयाः । विधिवद् दक्षिणावन्ति यदि दण्डो न पालयेत् ।। ३९ ।। यदि दण्ड धर्मका पालन न करावे तो विधि-पूर्वक दक्षिणाओंसे युक्त संवत्सरयज्ञ भी बेखटके न होने पावे ।। ३९ ।। चरेयुर्नाश्रमे धर्मं यथोक्तं विधिमाश्रिताः । न विद्यां प्राप्नुयात् कश्चिद् यदि दण्डो न पालयेत् ।। ४० ।। यदि दण्ड मर्यादाका पालन न करावे तो लोग आश्रमोंमें रहकर विधिपूर्वक शास्त्रोक्त धर्मका पालन न करें और कोई विद्या भी न पढ़ सके ।। ४० ।। न चोष्ट्रा न बलीवर्दा नाश्वाश्वतरगर्दभाः । युक्ता वहेयुर्यानानि यदि दण्डो न पालयेत् ।। ४१ ।। यदि दण्ड कर्तव्यका पालन न करावे तो ऊँट, बैल, घोड़े, खच्चर और गदहे रथोंमें जोत दिये जानेपर भी उन्हें ढोकर ले न जायँ ।। ४१ ।। न प्रेष्या वचनं कुर्युर्न बाला जातु कर्हिचित् । न तिष्ठेद् युवती धर्मे यदि दण्डो न पालयेत् ।। ४२ ।। यदि दण्ड धर्म और कर्तव्यका पालन न करावे तो सेवक स्वामीकी बात न माने, बालक भी कभी माँ-बापकी आज्ञाका पालन न करें और युवती स्त्री भी अपने सतीधर्ममें स्थिर न रहे ।। ४२ ।। दण्डे स्थिताः प्रजाः सर्वा भयं दण्डे विदुर्बुधाः ।