महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1125, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंमित्रद्रोही कुलाङ्गारः पापकर्मा नराधमः ॥ २४ ॥
जो पापी, कृतघ्न, निर्लज्ज, मित्रद्रोही, कुलाङ्गार और पापाचारी हो, ऐसे अधम मनुष्यका विद्वान् पुरुष सदा त्याग करे ॥ २४ ॥
एष धर्मभृतां श्रेष्ठ प्रोक्तः पापो मया तव ।
मित्रद्रोही कृतघ्नो वै किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ २५ ॥
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! इस प्रकार यह मैंने तुम्हें पापी, मित्रद्रोही और कृतघ्न पुरुषका परिचय दिया है। अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥ २५ ॥
वैशम्पायन उवाच
एतच्छ्रुत्वा तदा वाक्यं भीष्मेणोक्तं महात्मना ।
युधिष्ठिरः प्रीतमना बभूव जनमेजय ॥ २६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! महात्मा भीष्मका यह वचन सुनकर राजा युधिष्ठिर मन ही मन बड़े प्रसन्न हुए ॥ २६ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कृतघ्नोपाख्याने
त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कृतघ्नका उपाख्यानविषयक एक सौ तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७३ ॥