भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 114, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 114

पशूनां वृषणं छित्त्वा ततो भिन्दन्ति मस्तकम् । वहन्ति बहवो भारान् बध्नन्ति दमयन्ति च ॥ ५१ ॥ बहुत-से मनुष्य पशुओं (बैलों)-का अण्डकोश काटकर फिर उसके मस्तकपर उगे हुए दोनों सींगोंको भी विदीर्ण कर देते हैं, जिससे वे अधिक बढ़ने न पावें। फिर उनसे भार ढुलाते हैं, उन्हें घरमें बाँधे रखते हैं और नये बच्चेको गाड़ी आदिमें जोतकर उसका दमन करते हैं—उनकी उद्दण्डता दूर करके उनसे काम करनेका अभ्यास कराते हैं ॥ ५१ ॥

एवं पर्याकुले लोके वितथैर्जर्जरीकृते । तैस्तैर्न्यायैर्महाराज पुराणं धर्ममाचर ॥ ५२ ॥ महाराज! इस प्रकार सारा जगत् मिथ्या व्यवहारोंसे आकुल और दण्डसे जर्जर हो गया है। आप भी उन्हीं-उन्हीं न्यायोंका अनुसरण करके प्राचीन धर्मका आचरण कीजिये ॥ ५२ ॥

यज देहि प्रजां रक्ष धर्मं समनुपालय । अमित्रान् जहि कौन्तेय मित्राणि परिपालय ॥ ५३ ॥ यज्ञ कीजिये, दान दीजिये, प्रजाकी रक्षा कीजिये और धर्मका निरन्तर पालन करते रहिये। कुन्तीनन्दन! आप शत्रुओंका वध और मित्रोंका पालन कीजिये ॥ ५३ ॥

मा च ते निघ्नतः शत्रून् मन्युर्भवतु पार्थिव । न तत्र किल्बिषं किंचित् कर्तुर्भवति भारत ॥ ५४ ॥ राजन्! शत्रुओंका वध करते समय आपके मनमें दीनता नहीं आनी चाहिये। भारत! शत्रुओंका वध करनेसे कर्ताको कोई पाप नहीं लगता ॥ ५४ ॥

आततायी हि यो हन्यादाततायिनमागतम् । न तेन भ्रूणहा स स्यान्मन्युस्तं मन्युमार्छति ॥ ५५ ॥ जो हाथमें हथियार लेकर मारने आया हो, उस आततायीको जो स्वयं भी आततायी बनकर मार डाले, उससे वह भ्रूण-हत्याका भागी नहीं होता; क्योंकि मारनेके लिये आये हुए उस मनुष्यका क्रोध ही उसका वध करनेवालेके मनमें भी क्रोध पैदा कर देता है ॥ ५५ ॥

अवध्यः सर्वभूतानामन्तरात्मा न संशयः । अवध्ये चात्मनि कथं वध्यो भवति कस्यचित् ॥ ५६ ॥ समस्त प्राणियोंका अन्तरात्मा अवध्य है, इसमें संशय नहीं है। जब आत्माका वध हो ही नहीं सकता तब वह किसीका वध्य कैसे होगा? ॥ ५६ ॥

यथा हि पुरुषः शालां पुनः सम्प्रविशेन्नवाम् । एवं जीवः शरीराणि तानि तानि प्रपद्यते ॥ ५७ ॥ देहान् पुराणानुत्सृज्य नवान् सम्प्रतिपद्यते । एवं मृत्युमुखं प्राहुर्जना ये तत्त्वदर्शिनः ॥ ५८ ॥