महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकौन जानता है कि किसका मृत्युकाल आज ही उपस्थित होगा? सम्पूर्ण जगत्पर प्रभुत्व रखनेवाली मृत्यु जब किसीको हरकर ले जाना चाहती है तो उसे पहलेसे निमन्त्रण नहीं भेजती है। जैसे मछुवारे चुपकेसे आकर मछलियोंको पकड़ लेते हैं, उसी प्रकार मृत्यु भी अज्ञात रहकर ही आक्रमण करती है ।।
युवैव धर्मशीलः स्यादनित्यं खलु जीवितम् । कृते धर्मे भवेत् कीर्तिरिह प्रेत्य च वै सुखम् ।। १६ ।। अतः युवावस्थामें ही सबको धर्मका आचरण करना चाहिये; क्योंकि जीवन निःसंदेह अनित्य है। धर्माचरण करनेसे इस लोकमें मनुष्यकी कीर्तिका विस्तार होता है और परलोकमें भी उसे सुख मिलता है ।।
मोहेन हि समाविष्टः पुत्रदारार्थमुद्यतः । कृत्वा कार्यमकार्यं वा पुष्टिमेषां प्रयच्छति ।। १७ ।। जो मनुष्य मोहमें डूबा हुआ है, वही पुत्र और स्त्रीके लिये उद्योग करने लगता है, और करने तथा न करने योग्य काम करके इन सबका पालन-पोषण करता है ।। १७ ।।
तं पुत्रपशुसम्पन्नं व्यासक्तमनसं नरम् । सुप्तं व्याघ्रो मृगमिव मृत्युरादाय गच्छति ।। १८ ।। जैसे सोये हुए मृगको बाघ उठा ले जाता है, उसी प्रकार पुत्र और पशुओंसे सम्पन्न एवं उन्हींमें मनको फँसाये रखनेवाले मनुष्यको एक दिन मृत्यु आकर उठा ले जाती है ।। १८ ।।
संचिन्वानकमेवैनं कामानामतिवृप्तकम् । व्याघ्रः पशुमिवादाय मृत्युरादाय गच्छति ।। १९ ।। जबतक मनुष्य भोगोंसे तृप्त नहीं होता, संग्रह ही करता रहता है, तभीतक ही उसे मौत आकर ले जाती है। ठीक वैसे ही, जैसे व्याघ्र किसी पशुको ले जाता है ।।
इदं कृतमिदं कार्यमिदमन्यत् कृताकृतम् । एवमीहासुखासक्तं कृतान्तः कुरुते वशे ।। २० ।। मनुष्य सोचता है कि यह काम पूरा हो गया, यह अभी करना है और यह अधूरा ही पड़ा है—इस प्रकार चेष्टाजनित सुखमें आसक्त हुए मानवको काल अपने वशमें कर लेता है ।। २० ।।
कृतानां फलमप्राप्तं कर्मणां कर्मसंज्ञितम् । क्षेत्रापणगृहासक्तं मृत्युरादाय गच्छति ।। २१ ।। मनुष्य अपने खेत, दूकान और घरमें ही फँसा रहता है, उसके किये हुए उन कर्मोंका फल मिलने भी नहीं पाता, उसके पहले ही उस कर्मासक्त मनुष्यको मृत्यु उठा ले जाती है ।। २१ ।।
दुर्बलं बलवन्तं च शूरं भीरुं जडं कविम् । अप्राप्तं सर्वकामार्थान् मृत्युरादाय गच्छति ।। २२ ।।