महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1142, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस प्रकार सत्यके द्वारा ही मनुष्य मृत्युपर विजय पा सकता है ॥ २९ ॥ अमृतं चैव मृत्युश्च द्वयं देहे प्रतिष्ठितम् । मृत्युमापद्यते मोहात् सत्येनापद्यतेऽमृतम् ॥ ३० ॥ अमृत और मृत्यु दोनों इस शरीरमें ही स्थित हैं। मनुष्य मोहसे मृत्युको और सत्यसे अमृतको प्राप्त होता है ॥ ३० ॥ सोऽहं ह्यहिंस्रः सत्यार्थी कामक्रोधबहिष्कृतः । समदुःखसुखः क्षेमी मृत्युं हास्याम्यमर्त्यवत् ॥ ३१ ॥ अतः अब मैं हिंसासे दूर रहकर सत्यकी खोज करूँगा, काम और क्रोधको हृदयसे निकालकर दुःख और सुखमें समान भाव रखूँगा तथा सबके लिये कल्याणकारी बनकर देवताओंके समान मृत्युके भयसे मुक्त हो जाऊँगा ॥ ३१ ॥ शान्तियज्ञरतो दान्तो ब्रह्मयज्ञे स्थितो मुनिः । वाङ्मनःकर्मयज्ञश्च भविष्याम्युदगायने ॥ ३२ ॥ मैं निवृत्तिपरायण होकर शान्तिमय यज्ञमें तत्पर रहूँगा, मन और इन्द्रियोंको वशमें रखकर ब्रह्मयज्ञ (वेद-शास्त्रोंके स्वाध्याय)-में लग जाऊँगा और मुनिवृत्तिसे रहूँगा। उत्तरायणके मार्गसे जानेके लिये मैं जप और स्वाध्यायरूप वाग्यज्ञ, ध्यानरूप मनोयज्ञ और अग्निहोत्र एवं गुरुशुश्रूषादिरूप कर्मयज्ञका अनुष्ठान करूँगा ॥ ३२ ॥ पशुयज्ञैः कथं हिंसैर्मादृशो यष्टुमर्हति । अन्तवद्भिरिव प्राज्ञः क्षेत्रयज्ञैः पिशाचवत् ॥ ३३ ॥ मेरे-जैसा विद्वान् पुरुष नश्वर फल देनेवाले हिंसायक्त पशुयज्ञ और पिशाचोंके समान अपने शरीरके ही रक्त-मांसद्वारा किये जानेवाले तामस यज्ञोंका अनुष्ठान कैसे कर सकता है? ॥ ३३ ॥ यस्य वाङ्मनसी स्यातां सम्यक् प्रणिहिते सदा । तपस्त्यागश्च सत्यं च स वै सर्वमवाप्नुयात् ॥ ४ ॥ जिसकी वाणी और मन दोनों सदा भलीभाँति एकाग्र रहते हैं तथा जो त्याग, तपस्या और सत्यसे सम्पन्न होता है, वह निश्चय ही सब कुछ प्राप्त कर सकता है ॥ ३४ ॥ नास्ति विद्यासमं चक्षुर्नास्ति सत्यसमं तपः । नास्ति रागसमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम् ॥ ३५ ॥ संसारमें विद्या (ज्ञान)-के समान कोई नेत्र नहीं है, सत्यके समान कोई तप नहीं है, आसक्ति एवं क्रोधके समान कोई दुःख नहीं है और त्यागके समान कोई सुख नहीं है ॥ ३५ ॥ आत्मन्येवात्मना जात आत्मनिष्ठोऽप्रजोऽपि वा । आत्मन्येव भविष्यामि न मां तारयति प्रजा ॥ ३६ ॥