भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1145, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1145

अकिंचनः परिपतन् सुखमास्वादयिष्यसि । अकिंचनः सुखं शेते समुत्तिष्ठति चैव ह ॥ ७ ॥ ‘यदि तुम सब कुछ त्यागकर किसी वस्तुका संग्रह नहीं रखोगे तो सर्वत्र विचरते हुए सुखका ही अनुभव करोगे; क्योंकि जो अकिंचन होता है—जिसके पास कुछ नहीं रहता है, वह सुखसे सोता और जागता है ॥ ७ ॥

आकिंचन्यं सुखं लोके पथ्यं शिवमनामयम् । अनमित्रपथो ह्येष दुर्लभः सुलभो मतः ॥ ८ ॥ ‘संसारमें अकिंचनता ही सुख है। वही हितकारक, कल्याणकारी और निरापद है। इस मार्गमें किसी प्रकारके शत्रुाका भी खटका नहीं है। यह दुर्लभ होनेपर भी सुलभ है ॥ ८ ॥

अकिंचनस्य शुद्धस्य उपपन्नस्य सर्वतः । अवेक्षमाणस्त्रीँल्लोकान् न तुल्यमिह लक्षये ॥ ९ ॥ ‘मैं तीनों लोकोंपर दृष्टि डालकर देखता हूँ तो मुझे अकिंचन, शुद्ध एवं सब ओरसे वैराग्यसम्पन्न पुरुषके समान दूसरा कोई नहीं दिखायी देता है ॥ ९ ॥

आकिंचन्यं च राज्यं च तुलया समतोलयम् । अत्यरिच्यत दारिद्र्यं राज्यादपि गुणाधिकम् ॥ १० ॥ ‘मैंने अकिंचनता तथा राज्यको बुद्धिकी तराजूपर रखकर तौला तो गुणोंमें अधिक होनेके कारण राज्यसे भी अकिंचनताका ही पलड़ा भारी निकला ॥ १० ॥

आकिंचन्ये च राज्ये च विशेषः सुमहानयम् । नित्योद्विग्नो हि धनवान् मृत्योरास्यगतो यथा ॥ ११ ॥ ‘अकिंचनता तथा राज्यमें बड़ा भारी अन्तर यह है कि धनी राजा सदा इस प्रकार उद्विग्न रहता है, मानो मौतके मुखमें पड़ा हुआ हो ॥ ११ ॥

नैवास्याग्निर्न चारिष्टो न मृत्युर्न च दस्यवः । प्रभवन्ति धनत्यागाद् विमुक्तस्य निराशिषः ॥ १२ ॥ ‘परंतु जो मनुष्य धनको त्यागकर उसकी आसक्तिसे मुक्त हो गया है और मनमें किसी तरहकी कामना नहीं रखता, उसपर न अग्निका जोर चलता है, न अरिष्टकारी ग्रहोंका, न मृत्यु उसका कुछ बिगाड़ सकती है, न डाकू और लुटेरे ही ॥ १२ ॥

तं वै सदा कामचरमनुपस्तीर्णशायिनम् । बाहूपधानं शाम्यन्तं प्रशंसन्ति दिवौकसः ॥ १३ ॥ ‘वह सदा दैव-इच्छाके अनुसार विचरता है। बिना बिछौनेके भूतपर सोता है। बाँहोंकी ही तकिया लगाता है और सदा शान्तभावसे रहता है। देवतालोग भी उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं ॥ १३ ॥

धनवान् क्रोधलोभाभ्यामाविष्टो नष्टचेतनः । तिर्यगीक्षः शुष्कमुखः पापको भ्रुकुटीमुखः ॥ १४ ॥

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