भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1153, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1153

'मैं तो समझता हूँ कि धनका नाश होनेपर जो अत्यन्त दुःख होता है, वही सबसे बढ़कर है; क्योंकि जो धनसे वञ्चित हो जाता है, उसे अपने भाई-बन्धु और मित्र भी अपमानित करने लगते हैं।। ३४ ।। अवज्ञानसहस्रैस्तु दोषाः कष्टतराऽधने । धने सुखकला या तु सापि दुःखैर्विधीयते ॥ ३५ ॥ 'दरिद्रको सहस्र-सहस्र तिरस्कार सहने पड़ते हैं; अतः निर्धन अवस्थामें बहुत-से कष्टदायक दोष हैं; और धनमें जो सुखका लेश प्रतीत होता है, वह भी दुःखोंसे ही सम्पादित होता है ।। ३५ ।। धनमस्येति पुरुषं पुरो निघ्नन्ति दस्यवः । क्लिश्यन्ति विविधैर्दण्डैर्नित्यमुद्वेजयन्ति च ॥ ३६ ॥ 'जिस पुरुषके पास धन होनेका संदेह होता है, उसे उसका धन लूटनेके लिये लुटेरे मार डालते हैं अथवा उसे तरह-तरहकी पीड़ाएँ देकर सताते और सदा उद्वेगमें डाले रहते हैं ।। ३६ ।। अर्थलोलुपता दुःखमिति बुद्धं चिरान्मया । यद् यदालम्बसे काम तत्तदेवानुरुध्यसे ॥ ३७ ॥ 'धनलोलुपता दुःखका कारण है, यह बात बहुत देरके बाद मेरी समझमें आयी है। काम! तू जिस-जिसका आश्रय लेता है, उसी-उसीके पीछे पड़ जाता है ।। ३७ ।। अतत्त्वज्ञोऽसि बालश्च दुस्तोषोऽपूरणोऽनलः । नैव त्वं वेत्थ सुलभं नैव त्वं वेत्थ दुर्लभम् ॥ ३८ ॥ 'तू तत्त्वज्ञानसे रहित और बालकके समान मूढ़ है, तुझे संतोष देना कठिन है। आगके समान तेरा पेट भरना असम्भव है। तू यह नहीं जानता कि कौन-सी वस्तु सुलभ है और कौन-सी दुर्लभ ।। ३८ ।। पाताल इव दुष्पूरो मां दुःखैर्योक्तुमिच्छसि । नाहमद्य समावेष्टुं शक्यः काम पुनस्त्वया ॥ ३९ ॥ 'काम! पातालके समान तुझे भरना कठिन है। तू मुझे दुःखोंमें फँसाना चाहता है; किंतु अब तू फिर मेरे भीतर प्रवेश नहीं कर सकता ।। ३९ ।। निर्वेदमहमासाद्य द्रव्यनाशाद् यदृच्छया । निर्वृत्तिं परमां प्राप्य नाद्य कामान् विचिन्तये ॥ ४० ॥ 'अकस्मात् धनका नाश हो जानेसे वैराग्यको प्राप्त होकर मुझे परम सुख मिल गया है। अब मैं भोगोंका चिन्तन नहीं करूँगा ।। ४० ।। अतिक्लेशान् सहामीह नाहं बुद्ध्याम्यबुद्धिमान् । निकृतो धननाशेन शये सर्वाङ्गविज्वरः ॥ ४१ ॥