भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1162, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1162

‘प्रह्लाद! देखो, जितने संयोग हैं, उनका पर्यवसान वियोगमें ही होता है और जितने संचय हैं, उनकी समाप्ति विनाशमें ही होती है। यह सब देखकर मैं कहीं भी अपने मनको नहीं लगाता हूँ ।। १२ ।। अन्तवन्ति च भूतानि गुणयुक्तानि पश्यतः। उत्पत्तिनिधनज्ञस्य किं कार्यमवशिष्यते ।। १३ ।। ‘जो गुणयुक्त सम्पूर्ण भूतोंको नाशवान् देखता है तथा उत्पत्ति और प्रलयके तत्त्वको जानता है, उसके लिये यहाँ कौन-सा कार्य अवशिष्ट रह जाता है? ।। १३ ।। जलजानामपि ह्यन्तं पर्यायेणोपलक्षये। महतामपि कायानां सूक्ष्माणां च महोदधौ ।। १४ ।। ‘महासागरके जलमें पैदा होनेवाले विशाल शरीरवाले तिमि आदि मत्स्यों तथा छोटे-छोटे कीड़ोंका भी बारी-बारीसे विनाश होता देखता हूँ ।। १४ ।। जङ्गमस्थावराणां च भूतानामसुराधिप। पार्थिवानांमपि व्यक्तं मृत्युं पश्यामि सर्वशः ।। १५ ।। ‘असुरराज! पृथ्वीपर भी जितने स्थावर-जंगम प्राणी हैं, उन सबकी मृत्यु मुझे स्पष्ट दिखायी दे रही है ।। १५ ।। अन्तरिक्षचराणां च दानवोत्तम पक्षिणाम्। उत्तिष्ठते यथाकालं मृत्युर्बलवतामपि ।। १६ ।। ‘दानवश्रेष्ठ! आकाशमें विचरनेवाले बलवान् पक्षियोंके समक्ष भी यथासमय मृत्यु आ पहुँचती है ।। १६ ।। दिवि संचरमाणानि ह्रस्वानि च महान्ति च। ज्योतींष्यपि यथाकालं पतमानानि लक्षये ।। १७ ।। ‘आकाशमें जो छोटे-बड़े ज्योतिर्मय नक्षत्र विचर रहे हैं, उन्हें भी मैं यथासमय नीचे गिरते देखता हूँ ।। १७ ।। इति भूतानि सम्पश्यन्ननुषक्तानि मृत्युना। सर्वसामान्यगो विद्वान् कृतकृत्यः सुखं स्वपे ।। १८ ।। ‘इस प्रकार सारे प्राणियोंको मैं मृत्युके पाशमें बद्ध देखता हूँ; इसलिये तत्त्वको जानकर कृतकृत्य हो सबके प्रति समान भाव रखता हुआ सुखसे सोता हूँ ।। १८ ।। सुमहान्तमपि ग्रासं ग्रसे लब्धं यदृच्छया। शये पुनरभुञ्जानो दिवसानि बहून्यपि ।। १९ ।। ‘यदि दैवेच्छासे अकस्मात् अधिक भोजन प्राप्त हो जाय तो मैं बहुत खा लेता हूँ, ग्रासमात्र मिले तो उसीमें संतुष्ट रहता हूँ और न मिला तो बहुत दिनोंतक बिना खाये-पीये भी सो रहता हूँ ।। १९ ।। आशयन्त्यपि मामन्नं पुनर्बहुगुणं बहु।