भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1165

करता हूँ॥ ३०॥ अपगतभयरागमोहदर्पो धृतिमतिबुद्धिसमन्वितः प्रशान्तः। उपगतफलभोगिनो निशम्य व्रतमिदमाजगरं शुचिंश्चरामि ॥ ३१ ॥ ‘मेरे भय, राग, मोह और अभिमान नष्ट हो गये हैं। मैं धृति, मति और बुद्धिसे सम्पन्न एवं पूर्णतया शान्त हूँ। और प्रारब्धवश स्वतः अपने समीप आयी हुई वस्तुका ही उपभोग करनेवालोंको देखकर मैं पवित्रभावसे इस आजगरव्रतका आचरण करता हूँ॥ ३१॥ अनियतशयनासनः प्रकृत्या दमनियमव्रतसत्यशौचयुक्तः। अपगतफलसंचयः प्रहृष्टो व्रतमिदमाजगरं शुचिंश्चरामि ॥ ३२ ॥ ‘मेरे सोने-बैठनेका कोई नियत स्थान नहीं है। मैं स्व भावतः दम, नियम, व्रत, सत्य और शौचाचारसे सम्पन्न हूँ। मेरे कर्मफल-संचयका नाश हो चुका है। मैं प्रसन्नतापूर्वक पवित्रभावसे इस आजगरव्रतका आचरण करता हूँ॥ ३२॥ अपगतमसुखार्थमीहनार्थे- रुपगतबुद्धिरवेक्ष्य चात्मसंस्थम्। तृषितमनियतं मनो नियन्तुं व्रतमिदमाजगरं शुचिंश्चरामि ॥ ३३ ॥ ‘जिनका परिणाम दुःख है, उन इच्छाके विषयभूत समस्त पदार्थोंसे जो विरक्त हो चुका है, ऐसे आत्मनिष्ठ महापुरुषको देखकर मुझे ज्ञान प्राप्त हो गया है। अतः मैं तृष्णासे व्याकुल असंयत मनको वशमें करनेके लिये पवित्रभावसे इस आजगर-व्रतका आचरण करता हूँ॥ ३३॥ न हृदयमनुरुध्य वाङ्मनो वा प्रियसुखदुर्लभतामनित्यतां च। तदुभयमुपलक्षयन्निवाहं व्रतमिदमाजगरं शुचिंश्चरामि ॥ ३४ ॥ ‘मन, वाणी और बुद्धिकी उपेक्षा करके इनको प्रिय लगनेवाले विषय-सुखोंकी दुर्लभता तथा अनित्यता—इन दोनोंको देखनेवालेकी भाँति मैं पवित्रभावसे इस आजगरव्रतका आचरण करता हूँ॥ ३४॥ बहुकथितमिदं हि बुद्धिमद्भिः कविभिरपि प्रथयद्भिरात्मकीर्तिम्। इदमिदमिति तत्र तत्र हन्त