महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1172, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ें'परंतु जिनके पास भगवान्के दिये हुए दस अंगुलियोंसे युक्त दो हाथ हैं, वे अपने अंगोंसे उन कीड़ोंको हटाते या नष्ट कर देते हैं, जो उन्हें डँसते हैं ।। १४ ।।
वर्षाहिमातपानां च परित्राणानि कुर्वते । चैलमन्नं सुखं शय्यां निवातं चोपभुञ्जते ॥ १५ ॥ 'वे वर्षा, सर्दी और धूपसे अपनी रक्षा कर लेते हैं, कपड़ा पहनते हैं, सुखपूर्वक अन्न खाते हैं, शय्या बिछाकर सोते हैं तथा एकान्त स्थानका उपभोग करते हैं ।। १५ ।।
अधिष्ठाय च गां लोके भुञ्जते वाहयन्ति च । उपायैर्बहुभिश्चैव वश्यानात्मनि कुर्वते ॥ १६ ॥ 'हाथवाले मनुष्य बैलोंसे जुती हुई गाड़ीपर चढ़कर उन्हें हाँकते हैं और जगत्में उनका यथेष्ट उपभोग करते हैं तथा हाथसे ही अनेक प्रकारके उपाय करके लोगोंको अपने वशमें कर लेते हैं ।। १६ ।।
ये खल्वजिह्वाः कृपणा अल्पप्राणा अपाणयः । सहन्ते तानि दुःखानि दिष्ट्या त्वं न तथा मुने ॥ १७ ॥ 'मुने! जो दुःख बिना हाथके दीन, दुर्बल और बेजबान प्राणी सहते हैं, सौभाग्यवश वे तो आपको नहीं सहने पड़ते हैं ।। १७ ।।
दिष्ट्या त्वं न शृगालो वै न कृमिर्न च मूषकः । न सर्पो न च मण्डूको न चान्यः पापयोनिजः ॥ १८ ॥ 'आपका बड़ा भाग्य है कि आप गीदड़, कीड़ा, चूहा, साँप, मेढ़क या किसी दूसरी पापयोनिमें नहीं उत्पन्न हुए ।। १८ ।।
एतावतापि लाभेन तोष्टुमर्हसि काश्यप । किं पुनर्योऽसि सत्त्वानां सर्वेषां ब्राह्मणोत्तमः ॥ १९ ॥ 'काश्यप! आपको इतने ही लाभसे संतुष्ट रहना चाहिये। इससे अधिक लाभ क्या होगा कि आप सभी प्राणियोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं ।। १९ ।।
इमे मां कृमयोऽदन्ति येषामुद्धरणाय वै । नास्ति शक्तिरपाणित्वात् पश्यावस्थामिमां मम ॥ २० ॥ 'मुझे ये कीड़े खा रहे हैं, जिन्हें निकाल फेंकनेकी शक्ति मुझमें नहीं है। हाथ न होनेके कारण होनेवाली मेरी इस दुर्दशाको आप प्रत्यक्ष देख लें ।। २० ।।
अकार्यमिति चैवेमं नात्मानं संत्यजाम्यहम् । नातः पापीयसीं योनिं पतेयमपरामिति ॥ २१ ॥ 'आत्महत्या करना पाप है; यह सोचकर ही मैं अपने इस शरीरका परित्याग नहीं करता हूँ। मुझे भय है कि मैं इससे भी बढ़कर किसी दूसरी पापयोनिमें न गिर जाऊँ ।। २१ ।।
मध्ये वै पापयोनीनां शार्गालीं यामहं गतः । पापीयस्यो बहुतरा इतोऽन्याः पापयोनयः ॥ २२ ॥