भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 119

यच्च ते द्रोणभीष्माभ्यां युद्धमासीदरिंदम । मनसैकेन योद्धव्यं तत्ते युद्धमुपस्थितम् ॥ २२ ॥ ‘शत्रुदमन नरेश! द्रोणाचार्य और भीष्मके साथ जो आपका युद्ध हुआ था, वैसा ही दूसरा युद्ध आपके सामने उपस्थित है, इस समय आपको एकमात्र अपने मनके साथ युद्ध करना है ॥ २२ ॥

यत्र नास्ति शरैः कार्यं न मित्रैर्न च बन्धुभिः । आत्मनैकेन योद्धव्यं तत्ते युद्धमुपस्थितम् ॥ २३ ॥ ‘इस युद्धमें न तो बाणोंका काम है, न मित्रों और बन्धुओंकी सहायताका। अकेले आपको ही लड़ना है। वह युद्ध आपके सामने उपस्थित है ॥ २३ ॥

तस्मिन्ननिर्जिते युद्धे प्राणान् यदि विमोक्ष्यसे । अन्यं देहं समास्थाय ततस्तैरपि योत्स्यसे ॥ २४ ॥ ‘इस युद्धमें विजय पाये बिना यदि आप प्राणोंका परित्याग कर देंगे तो दूसरा देह धारण करके पुनःउन्हीं शत्रुओंके साथ आपको युद्ध करना पड़ेगा ॥ २४ ॥

तस्मादद्यैव गन्तव्यं युद्ध्यस्व भरतर्षभ । परमव्यक्तरूपस्य व्यक्तं त्यक्त्वा स्वकर्मभिः ॥ २५ ॥ ‘भरतश्रेष्ठ! इसलिये प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाले साकार शत्रुको छोड़कर अव्यक्त (सूक्ष्म) शत्रु मनके साथ युद्ध करनेके लिये आपको अभी चल देना चाहिये। विचार आदि अपनी बौद्धिक क्रियाओंद्वारा उसके साथ आप अवश्य युद्ध करें ॥ २५ ॥

तस्मिन्ननिर्जिते युद्धे कामवस्थां गमिष्यसि । एतज्जित्वा महाराज कृतकृत्यो भविष्यसि ॥ २६ ॥ एतां बुद्धिं विनिश्चित्य भूतानामागतिं गतिम् । पितृपैतामहे वृत्ते शाधि राज्यं यथोचितम् ॥ २७ ॥ ‘महाराज! यदि युद्धमें आपने मनको परास्त नहीं किया तो पता नहीं आप किस अवस्थाको पहुँच जायँगे? और यदि मनको जीत लिया तो अवश्य कृतकृत्य हो जायँगे। प्राणियोंके आवागमनको देखते हुए इस विचारधाराको बुद्धिमें स्थिर करके आप पिता-पितामहोंके आचारमें प्रतिष्ठित हो यथोचित रूपसे राज्यका शासन कीजिये ॥ २६-२७ ॥

दिष्ट्या दुर्योधनः पापो निहतः सानुगो युधि । द्रौपद्याः केशपाशस्य दिष्ट्या त्वं पदवीं गतः ॥ २८ ॥ ‘सौभाग्यकी बात है कि पापी दुर्योधन सेवकोंसहित युद्धमें मारा गया; और सौभाग्यसे ही आप दुःशासनके हाथसे मुक्त हुए द्रौपदीके केशपाशकी भाँति युद्धसे छुटकारा पा गये ॥ २८ ॥

यजस्व वाजिमेधेन विधिवद् दक्षिणावता । वयं ते किंकराः पार्थ वासुदेवश्च वीर्यवान् ॥ २९ ॥